DDU: भारतीय रेल बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी में है, लेकिन पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के डीडीयू (मुगलसराय) रेल मंडल ने बिना ट्रेन हिलाए ही प्रगति की ऐसी ‘अदृश्य’ रफ्तार पकड़ ली है कि न्यूटन और आइंस्टीन के सिद्धांत भी शरमा जाएं। आम जनता सोचती है कि ट्रेनें पटरियों पर दौड़ती हैं, लेकिन डीडीयू मंडल के कुछ महारथियों ने साबित कर दिया है कि असली और सबसे मुनाफे वाली ड्यूटी सिर्फ ‘कागजों’ पर दौड़ती है।
कहने को तो मंडल में 6-7 सेक्शन हैं, जहां लोको पायलट अपनी जान हथेली पर रखकर दिन-रात ट्रेनों का परिचालन करते हैं। इन चालकों से नियमों का कड़ाई से पालन करवाने और सुरक्षा सुनिश्चित करने की शत-प्रतिशत जिम्मेदारी ‘चीफ लोको इंस्पेक्टर’ (CLI) साहब की होती है। इनका मुख्य काम होता है ‘फुटप्लेट’ यानी इंजन में बैठकर चालकों की मॉनिटरिंग करना। नियम तो इतने सख्त हैं कि डीईई (DEE) और सीनियर डीईई साहब को भी समय-समय पर फुटप्लेट पर चढ़ना पड़ता है। लेकिन जब बाड़ ही खेत को खाने लगे, तो नियमों की गिट्टी बिखरना तय है।
‘वर्क फ्रॉम होम’ और ‘ट्रांसफर-प्रूफ’ जुगलबंदी
डीडीयू मंडल के पास दो ऐसे नायाब और ‘कोहिनूर’ हीरा रूपी सीएलआई (CLI) हैं, जिनके नाम हैं—इन्दु प्रकाश सिंह और सईद जाफ़रुल हक। इन दोनों महाशयों के कागजी फुटप्लेट के रिकॉर्ड इतने भारी हैं कि फाइलें भी वजन से हांफने लगती हैं। हकीकत की जमीन पर पैर न रखने वाले ये दोनों होनहार अधिकारी डीईई (OP) अमन कुमार साहब के इतने अजीज और चहेते हैं कि इनके आगे रेलवे की ट्रांसफर पॉलिसी भी घुटने टेक देती है।
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सालों बाद जब व्यवस्था को जगाने के लिए इनका ट्रांसफर डीडीयू से गया और गया से डीडीयू किया गया, तो लगा कि अब शायद पटरियों की किस्मत बदलेगी। मगर साहब, यह तो ‘नजर का धोखा’ था! गया से स्थानांतरित होकर आए सैयद जाफ़रुल हक साहब की काबिलियत से अधिकारी इतने गदगद थे कि उन्हें तुरंत ‘चीफ टीएलसी’ (TLC) के मखमली पद से नवाज कर फिर से कुर्सी पर चिपका दिया गया। दूसरी तरफ, इन्दु प्रकाश सिंह जी का ट्रांसफर भले ही गया का हुआ हो, लेकिन उनका दिल और शरीर डीडीयू से टस से मस नहीं हुआ। वे डीडीयू में ही रहकर, या यूं कहें कि बाबा विश्वनाथ की नगरी बनारस के घाटों से बैठकर ‘रिमोट कंट्रोल’ द्वारा अपनी पावन रेल सेवा दे रहे हैं।
मजे की बात तो यह है कि पूरे रेल मंडल के 6-7 सेक्शनों में से इन दोनों महारथियों को सिर्फ दो ही सेक्शन दिखाई देते हैं—’डीडीयू से गया’ या ‘गया से डीडीयू’। बाकी के सेक्शन शायद इनके दिव्य चश्मे में फिट ही नहीं बैठते। महीने में एकाध बार अन्य सेक्शन का फर्जी फूटप्लेट के दर्शन हो जाए तो गनीमत है, बाकी दिन तो घर बैठे-बैठे ‘कागजी फुटप्लेट’ एवम् अन्य संबंधित ड्यूटी का ऐसा जादुई खेल चलता है कि हर महीने रेल खजाने को हजारों-लाखों का चूना लगाकर फर्जी किलोमीटर भत्ता सीधे बैंक खातों में लैंड करता है। अब देश सेवा और रेल सेवा की कसम खाकर भर्ती हुए ये सीएलआई जब पूरी निष्ठा से ‘अधिकारी सेवा’ में लीन रहेंगे और समय-समय पर ‘चढ़ावा’ चढ़ाते रहेंगे, तो भ्रष्टाचार का ऐसा अटूट आपसी तालमेल और सिंडिकेट बनना तो स्वाभाविक ही है!
‘थ्री-टियर’ क्लास सिस्टम और ओवरटाइम की मलाई
इस बहती गंगा में हाथ धोने वाले अकेले नहीं हैं। डीडीयू के मुख्य क्रू नियंत्रक (CCC) महावीर सिंह यादव जी ने भी अपनी पूरी नौकरी डीडीयू की मखमली गोद में बिताकर वफादारी की एक मिसाल कायम की है। तीन साल का तय कार्यकाल कब का बीत चुका है, लेकिन कुर्सी से इनका फेविकोल का जोड़ इतना मजबूत है कि कोई हिला नहीं सका। यादव जी ने लोको पायलटों और रनिंग स्टाफ को तीन जातियों में बांटकर नया समाजशास्त्र लिख दिया है:
- 1. मेहनती वर्ग (जो चुपचाप बिना आवाज किए पिस रहा है)
- 2. ओवरटाइम भत्ते के भूखे कर्मचारी (साहब के वफादार)
- 3. रसूखदार कामचोर वर्ग (अधिकारियों के वरदहस्त वाले)
ओवरटाइम के लालची वर्ग पर सीसीस डीडीयू का ऐसा फुल कमांड है कि वे मोटी कमाई के चक्कर में हर काम के लिए तुरंत हां बोल देते हैं। चाहे परिचालन संबंधी सुरक्षा नियमों के परखच्चे उड़ जाएं,स्वयं कर दूसरों के जीवन को खतरे में डालकर ये लोग 16-16 घंटे लगातार ड्यूटी करने को तैयार रहते हैं। जाहिर है, जब थका हुआ दिमाग इंजन चलाएगा तो सुरक्षा भगवान भरोसे ही होगी। और इस अंधे खेल का पूरा खामियाजा भुगतना पड़ता है उस सीधे और ईमानदार ‘मेहनती वर्ग’ को की जब वो कर सकता है तो तुम क्यों नहीं के सिद्धांत को लागू कर।

वहीं दूसरी तरफ, ‘कामचोर वर्ग’ के रसूखदार पायलटों पर साहब का कोई जोर नहीं चलता, क्योंकि उन्हें संबंधित विभाग के बड़े हाकिमों की छत्रछाया प्राप्त है। ये ‘वीआईपी’ कर्मचारी पूरे महीने धूप और धूल से बचकर एसी केबिन की कुर्सी तोड़ते हैं और बिना गाड़ी चलाए पूरा ‘रनींग अलाउंस’ डकार जाते हैं। रेल प्रशासन की आंखों में धूल झोंकने के लिए महीने में दो-चार बार ‘लाइन ड्यूटी’ का कोरम पूरा कर दिया जाता है।
परिणाम यह है कि जहाँ एक तरफ एक आम कर्मचारी 14 दिनों में 140-140 घंटे की जानलेवा ड्यूटी करके अपनी हड्डियां गला रहा है, वहीं दूसरी तरफ इन खास लोगों के पूरे महीने में 70 घंटे भी नहीं पूर पाते। यह कैसी अद्भुत और दिव्य परिचालन व्यवस्था डीडीयू के अधिकारियों ने बनाई है, जिसमें केवल और केवल रेलवे के राजस्व का नुकसान हो रहा है और अनावश्यक 40-40 घंटों का ओवरटाइम बांटा जा रहा है!
बड़े साहब का ‘मौनव्रत’ और पाप का घड़ा
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि डीडीयू के सबसे बड़े हाकिम यानी डीआरएम महोदय इन कारनामों से अनजान हैं। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी ‘गांधारी’ की तरह आँखों पर पट्टी बांध लेना और ‘धृतराष्ट्र’ बनकर मौन बैठना, इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इस संगठित सिंडिकेट की कड़ियां ऊपर तक जुड़ी हुई हैं।

अभी पिछले ही महीने एक जांबाज और पीड़ित रेलकर्मी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाकर, पूरे साक्ष्यों और पुख्ता सबूतों के पुलंदे के साथ डीआरएम साहब की टेबल पर इन फर्जी फुटप्लेट और किलोमीटर भत्ते के घोटाले की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। उम्मीद थी कि कोई बड़ा एक्शन होगा, विजिलेंस दौड़ेगी। लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद भी साहब की फाइल पर ‘मौनव्रत’ का ताला लटका हुआ है। साक्ष्यों को दबाकर बैठना साफ इशारा करता है कि इस बहती गंगा के प्रसाद में सबकी मूक सहमति शामिल है।

लेकिन अधिकारी और उनके चहेते सीएलआई यह भूल रहे हैं कि रेलवे की पटरी जितनी भी लंबी हो, उसका एक अंत जरूर होता है। बड़ों-बुजुर्गों की वह शाश्वत कहावत डीडीयू मंडल के इस सिंडिकेट पर जल्द ही पूरी तरह चरितार्थ होने वाली है – “पाप का घड़ा जब पूरी तरह भर जाता है, तो वह एक दिन बीच चौराहे पर जरूर फूटता है।” अब देखना यह है कि डीडीयू मंडल के इस घड़े के फूटने की गूंज और इसकी छींटें दिल्ली (रेलवे बोर्ड) तक कब पहुंचती हैं!
सफ़र जारी है..





