DDU: कहते हैं कि जब सल्तनत का सिपहसालार ही ‘अनुभवहीनता’ के कोहरे में खोया हो, तो मातहत अधिकारी अपनी मनमर्जी के ‘मस्त’ शहंशाह बन जाते हैं और जनता यानी की रनिंग कर्मचारी त्रस्त होकर बस अपनी किस्मत को रोती है। आजकल कुछ ऐसा ही नजारा पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के पंडित दीनदयाल उपाध्याय (DDU) रेल डिवीजन में देखने को मिल रहा है। इसे देखकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी की आत्मा भी कह रही होगी—”अंधेर नगरी, चौपट राजा…”
सीबीआई का भूचाल और ‘ताज’ का नया खेल
साल 2025 में जब सीबीआई (CBI) ने इस डिवीजन के तंत्र पर धावा बोला, तो एक ऐसा भूचाल आया जिसने पूरे सिस्टम को अस्त-व्यस्त कर दिया। तत्कालीन डीआरएम साहब का बोरिया-बिस्तर बंध गया। उम्मीद थी कि अब कोई मझा हुआ ‘सारथी’ कमान संभालेगा, लेकिन कमान मिली एक ऐसे नए निजाम को जिन्हें रेल डिवीजन चलाने का कोई खास पुराना तजुर्बा ही नहीं था। बस, यहीं से शुरू हुआ डीडीयू के कर्मठ रनिंग कर्मचारियों की दुर्दशा का नया अध्याय।
इस नए राज-काज में एक ‘होनहार और करमधार’ रत्न चमके—DEE/OP/DDU अमन कुमार। साहब को शायद लगा कि सीबीआई की कार्रवाई के असली गुनहगार तो ये चौबीसों घंटे पटरी पर दौड़ने वाले रनिंग कर्मचारी ही हैं। फिर क्या था? पद और पावर के सुरूर में चुन-चुनकर बदले की भावना से कार्रवाई का ऐसा चक्रव्यूह रचा गया कि कर्मचारी त्राहि-त्राहि कर उठे।
लोकपाल का डर और पुरस्कारों की रेवड़ी
इस व्यवस्था की कलाबाजी तो देखिए! करीब 15 महीनों से अवैध ट्रांसफर की तलवार लटका कर रखी गई। लेकिन जैसे ही मामला ‘लोकपाल’ की दहलीज पर फंसा और साहब की अपनी गर्दन फंसने की बारी आई, तो रातों-रात ट्रांसफर रोकने की ‘अनुशंसा’ (Recommedation) का यू-टर्न ले लिया गया। इतना ही नहीं, इस ‘अद्भुत’ कार्यशैली के लिए जीएम (GM/ECR) पुरस्कार की अनुशंसा भी कर डाली गई। वाह! इसे कहते हैं—’चित भी मेरी, पट भी मेरी।’
नियम कहते हैं कि रनिंग कर्मचारी ‘सेंसिटिव पोस्ट’ के दायरे में नहीं आते, लेकिन यहाँ ट्रांसफर-पोस्टिंग का ऐसा खेल शुरू हुआ कि कथित तौर पर ‘धन की उगाही’ ही मुख्य एजेंडा बन गई।
135 लोको पायलटों का ‘रफ्तार-विहीन’ प्रमोशन
इस अंधेर नगरी का सबसे नायाब उदाहरण कार्यालय आदेश संख्या 1533/2024 (दिनांक 28/11/2024) है। इस आदेश के जरिए 135 लोको पायलटों के प्रमोशन की एलिजिबिलिटी लिस्ट निकाली गई। इसमें कुछ ऐसे ‘चमत्कारी’ नाम भी शामिल हो गए जो रेल सेवा में आने के बाद से आज तक कभी मुख्य लाइन (Line) पर ट्रेन चलाने गए ही नहीं! ऑफिस की फाइलों के बीच बैठकर ही वे सारे प्रमोशन डकारते रहे।
अब इन 135 भाग्यशालियों को एक साथ प्रमोट करने के बजाय 25-30 के टुकड़ों में लोको पायलट बनाया जा रहा है। क्यों? ताकि प्रमोशन और प्रशासन का ऐसा ‘सामूहिक गठजोड़’ बना रहे, जिससे ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर जेबें गर्म होती रहें। भले ही इसके चक्कर में रेलवे के राजस्व को ट्रांसफर अलाउंस (Transfer Allowance) के रूप में लाखों का चूना लगता रहे। यही वजह है कि 18 महीने बीत जाने के बाद भी इन मात्र 135 लोगों की पूरी पोस्टिंग आज तक पूरी नहीं हो पाई है।
‘फैमिली ग्राउंड’ का नया आविष्कार और फाइव स्टार रनिंग रूम का सच
डीडीयू डिवीजन में ट्रांसफर का गणित भी अनोखा है। जो ट्रांसफर नहीं जाना चाहता, उसके लिए ‘विशेष दक्षिणा’ की व्यवस्था है। मेडिकल और स्पाउस (पति-पत्नी) ग्राउंड तो पुराने हो गए थे, इसलिए साहबों ने ‘फैमिली ग्राउंड’ नाम के एक नए बहाने का सृजन कर दिया, ताकि चहेतों को मनचाही छूट दी जा सके।
डिवीजन में एक तरफ लोको पायलट और क्रू कंट्रोलर की भारी किल्लत का रोना रोया जाता है, तो दूसरी तरफ डीडीयू रनिंग रूम में पहले से डी-कैटेगरी (Decategorised) होकर क्रू नियंत्रक बने कर्मचारियों के होते हुए भी, वहाँ एक्स्ट्रा लोको पायलटों की बहाली कर दी गई है। आखिर ये लोको पायलट वहाँ कौन सा तीर मार रहे हैं?
रेल मंत्री जी ने तो सपना दिखाया था ‘फाइव स्टार’ जैसी आधुनिक सुविधाओं वाले रनिंग रूम का। लेकिन बरवाडीह में रेल कोच के भीतर बने रनिंग रूम का सच कुछ और ही है। 12 से 16 घंटे की हाड़-तोड़ ड्यूटी करके आने के बाद भी थके-हारे चालकों को एक बेड पाने के लिए 4-4 घंटे इंतजार करना पड़ता है। ऊपर से ‘सब्सिडी मील’ (Subsidy Meal) के नाम पर जो घटिया खाना परोसा जाता है, वह किसी सजा से कम नहीं है।
हमारा खाकर, हमीं को आंख दिखाना!
यह सब तब हो रहा है जब इन सुविधाओं के बदले रनिंग कर्मचारियों के अलाउंस से 30% रकम की कटौती की जाती है। यानी पैसे भी हमारे और जिल्लत भी हमारी! रनिंग रूम में ठेकेदारी प्रथा पर काम कर रहे कर्मचारी और अधिकारी इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रहे हैं—”हमारा खाकर, हमीं को आँख दिखा रहे हैं।”
जब तक डीडीयू रेल डिवीजन में ‘अनुभवहीनता का राज’ और ‘पावर का नशा’ इसी तरह पटरी पर दौड़ता रहेगा, तब तक व्यवस्था ‘चौपट’ ही रहेगी और भारतीय रेल का चक्का थामने वाले रनिंग कर्मचारी इसी तरह ‘त्रस्त’ रहेंगे।





