साहब के बेटे, बेटी की शादी – रेलवे की बर्बादी !

साहब के बेटे, बेटी की शादी – रेलवे की बर्बादी !

पटना. बेटे-बेटी के शादी के नाम पर नीचे के अधिकारियों और कर्मचारियों से धन उगाही रेलवे में कोई नई खबर नहीं है। ये होते आया है और आगे होते भी रहेगा। कभी कभार उगाही के तरीके बदल जाते हैं। कोई डायरेक्ट वसूली में भरोसा जताता हैं तो कोई वाया मीडिया तलाश लेता है। आजकल एक और नया मोड आया है आउटसोर्सिंग । इस व्यवस्था के तहत अग्रिम करार के आधार पर पूरा का पूरा शादी का इंतज़ाम या कोई एक सबसे खर्चीला इंतज़ाम पोस्टिंग के बदले आउटसोर्स कर दी जाती है ।

इस विषय पर एक अधिकारी ने अपनी आप बीती सुनाई थी।

नए पद पर नई नई पोस्टिंग हुई थी, कुछ ही दिन के बाद एक समकक्ष समूह-“क”अधिकारी का फोन आया, कहा- चंदा भेज दीजियेगा, पूछा- किस बात का, विश्वकर्मा पूजा तो हो चुका, वो तो मैं दे चुका हूँ। बड़े साहबों के आने पर खाने- पीने का चंदा भी महीने के शुरूआत में ही दे चुका हूँ । अपने मासिक खर्च दूध, राशन के साथ-साथ इस खर्च को भी लिख लिया है, अगला वेतन मिलने से भिजवा देंगे।

अरे सिन्हा जी, – बात तो सुनिये, साहब की बेटी की शादी है, उसके लिए चंदा चाहिये।

मैं भौंचक हो गया- साहब इतने बड़े अधिकारी है, लगभग 30 वर्ष की नौकरी हो गई है, Group- A अधिकारी है, अच्छा वेतन है। मितव्ययी भी है। फिर , ऐसी क्या नौबत आ गई कि साहब को बेटी की शादी के लिये चन्दा लेना पड़ रहा है? बड़ा पशोपेश में पड़ा था।

इतना सब सोच ही रहा था तभी फोन करने वाले ने अधिकार पूर्वक आदेशात्मक स्वर में कहा-दस हजार रुपया चंदा भेज दीजियेगा, मैं कुछ कह पाता, इसके पहले उन्होंने फोन काट दिया।

कुछ दिन के बाद फिर उनका फोन आया- सिन्हा जी अपना चंदा नहीं भेजा, मैंने कहा- भेज दूंगा, कितना भेजना है? कहा- जितना कहा है, उससे कम नहीं, मतलब दस हजार। मैं भौंचक हो गया, दस हजार, इतने में शादी हो जायेगी ? वे हँसे, बोले- शादी तो करोडों में हो रही है, हम लोग उनको गिफ्ट देने के लिए चंदा जमा कर रहे हैं, मैंने कहा-मुझसे जो बन पड़ेगा,शाम में भेज दूंगा और शाम में एक गुलाबी लिफ़ाफ़े में 500 रुपया का एक हरा नोट भेज दिया, उधर से गुस्साए हुए साहब ने कहा- अरे सिन्हा जी- साहब की बेटी को हीरे का हार गिफ्ट देना है, चांदी का पायल नहीं। साहब के हैसियत के हिसाब से गिफ्ट देना होता है।

अब मैं भी थोड़ा नाराज़ हो गया,बोला – आप बड़े हैं- आप इधर-उधर का खाते होंगे, मैं अभी नया नया हूं, वेतन के अलावा कुछ देखा नहीं, साहब बड़े होंगे, पर मैं अपने हिसाब से चंदा दूंगा, आपको रखना है तो रखिये, नहीं तो वापस कर दीजिए। टका सा मूंह लटकाकर फ़ोन काट दिया।
उनका फ़ोन कटते ही उनसे बड़े साहब का भी फोन आ गया, उन्होंने भी वही बात दुहरा दिया. मैंने, फिर भी मना कर दिया। फ़िर वो मनाने के लिए बोले, अरे सिन्हा- तुम्हें तो मैंने दस हजार देने के लिए कहा था, मैं बता नहीं पाऊंगा- मैंने कितने का प्रबंध किया है।

मेरा जवाब वही था, और कहा, साहब- मैं अपने ही हैसियत के हिसाब से उनकी बेटी की शादी के लिए गिफ्ट दे पाऊँगा, रखना है तो रखें, नहीं तो वापस कर दें।
फ़िर मेरी उत्कंठा बढ़ गई और मैंने एक अन्य सहकर्मी को फोन लगाया और अपनी बात कही, उधर से जो कही गई वो मेरे सोच से बाहर की थी।
साहब के फील्ड में आने पर खाने पीने का खर्चा फील्ड वाले ही उठाते हैं।पटना वाले साहब हर सप्ताह दो- तीन बाहर ही रहते हैं, इससे खाने-पीने का उनका आधा खर्चा बच जाता है। ऊपर से दूसरा फील्ड यूनिट उनके घर का पूरा राशन पानी भेज देता है, रसोइया के वेतन के साथ-साथ।

तीसरा यूनिट मैडम के घर का राशन पानी, ड्राइवर और रसोइया के वेतन के साथ-साथ मेड का वेतन भी भेज देता है।
इस पर मैंने कहा कि साहब का वेतन तो पुरा ही बच जाता होगा और तब तो शादी धूम धाम से होगी। उन्होंने दूसरा बम फोड़ दिया,- सब कुछ फील्ड से हो रहा है. सबको अलग अलग इन्तेजाम करने को मिला है। किसी को होटल बुक करने का, किसी को केटरिंग, किसी को 50 गाड़ी का, किसी को गेस्ट का गिफ्ट देना है. सबका ड्यूटी भी बंटा है. किसी को एयरपोर्ट पर, किसी को रेलवे स्टेशन दानापुर, किसी को पटना या किसे राजेंद्र नगर
में रहना है. हर होटल, गेस्ट हाउस में शिफ्ट की ड्यूटी लगी है।

मैंने पूछ दिया- मुझे भी ड्यूटी मिला है क्या ? बताया गया- प्लानिंग तो हो रही थी तो आपके एटिट्यूड को देखते हुए आपको बारात के इंतजाम में इस डर से नहीं लगाया कि आप कहीं कोई गडबड झाला न कर दें।

मैंने राहत की साँस ली। किसी ने सही कहा है- वेश्या रूठे, इज़्ज़त बचे।

ये तो लगभग 15 साल पुरानी बात हो गई पर इस परम्परा में नए नये आयाम जुड़ते जा रहे हैं.. अब दान और इन्तेजाम के आधार पर व्यवस्थापक अधिकारी को पारितोषिक के रूप में अच्छी मालदार पोस्टिंग देने की परम्परा चल पड़ी है। क्यूँ न हो- साहब अपने विभाग के राजा होते हैं और राजा अपने सिपहसलारों को इनाम न दें, ऐसा कैसे हो सकता है? पुराने राजा- महाराजा की तरह मोतियों की माला, कंगन या कंठाहार की जगह ब्रांच अधिकारी का पद तो दे ही सकते हैं- सो देते हैं, और जिनके दान में कमी आयी उन्हें Sick line या stunting Neck में डालने में कोई देरी नहीं। हाल फिलहाल में दो- तीन बड़े साहबों के बच्चे का विवाह संपन्न हुआ है और सबमें लगभग इन्हीं तरीकों का प्रयोग हुआ है।

ऐसा ही नया मामला प्रकाश में आया है…

एक विभाग विशेष के वरीय अधिकारी ने यही फार्मूला अपनाया है । साहब जल्दी में हैं और जोड़ तोड़ और मरोड़ के महारथी हैं , ईसीआर के पुराने खिलाड़ी होने के कारण सारे डायनामिक्स के विशेष ज्ञाता हैं । विभाग जिसको propriety बहाल रखने का जिम्मा दिया गया है उसके प्रधान ने विभाग को property समझ लिया हैं और पोस्ट बांट रहे हैं । सुनने में आया है कि पोस्टिंग के बदले शादी की कॉस्टिंग का फार्मूला अपनाया गया है । पहले से प्रतीक्षारत अधिकारियों को दरकिनार कर बोली लगाने वाले अधिकारियों को इस काम का जिम्मा दिया गया हैं । ये भ्रष्टाचार का ही एक तरीका है ये डायरेक्ट करप्शन ना होकर आउटसोर्स्ड करप्शन हैं। आश्चर्य इस बात का है कि ऊपर ‌बैठे निजाम इस बात को जानकर भी अनभिज्ञ बनें हुए हैं, क्यों न बने, क्योंकि इन्होंने भी इससे मिलते-जुलते तरीके का प्रयोग किया था। खुद गुड़ खाने वाले दूसरों को गुड़ खाने से कैसे मना करें?

देखते हैं,उस विशेष विभाग में प्रस्तावित Transfer-Posting पर ब्रेक लगता है या Accelerator? जल्दी ही ख़बर बाहर आ जायगा, तब तक निमंत्रण पत्र और पोस्टिंग आदेश का इंतजार करते हैं।

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