ECR: जैश का कैश और लोकैलिटी का तैश: रेल के सारे नियम हो रहे क्रैश !

ECR: जैश का कैश और लोकैलिटी का तैश: रेल के सारे नियम हो रहे क्रैश !
  • डीडीयू रेल मंडल में भ्रष्टाचार और तानाशाही का चरम रक्षक ही बने भक्षक !

मुगलसराय (डीडीयू): भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन जब इसी व्यवस्था के रखवाले ही इसके नियमों को कुचलने लगें, तो पूरी व्यवस्था तार-तार हो जाती है। पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के पंडित दीनदयाल उपाध्याय (DDU) रेल मंडल में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल है। भ्रष्टाचार, रसूख और पद के दुरुपयोग की एक ऐसी काली पटकथा लिखी जा रही है, जिसने रेल कर्मचारियों के मनोबल को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। इस काली कहानी के मुख्य किरदार हैं— जैश कुमार, जो अपनी ‘कैश’ (काली कमाई) की ताकत और ‘लोकैलिटी’ (क्षेत्रवाद) के तैश में आकर खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

आत्मसम्मान पर चोट: महिला उत्पीड़न और प्रताड़ना का गंदा खेल !

कुछ समय पहले ही यह शर्मनाक मामला सामने आया था कि किस तरह जैश कुमार ने दिनांक 24-06-2025 को एक कर्मचारी की पत्नी के साथ अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कथित रूप से घोर दुर्व्यवहार किया। मर्यादा की सारी सीमाएं लांघने के बाद भी अहंकार शांत नहीं हुआ। तत्कालीन सीनियर डीपीओ इंचार्ज (Sr. DPO Incharge) के पद पर रहते हुए जैश कुमार ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर और DRM/DDU और अमन कुमार के सहयोग से उस पीड़ित परिवार को लगातार मानसिक और प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित कराया। न्याय की गुहार लगाने वाले एक रेल कर्मचारी के परिवार को सरकारी तंत्र के जरिए डराया-धमकाया गया, RPF का गलत इस्तेमाल किया गया, पद के प्रभाव से स्थानीय लोकल पुलिस को अपने पक्ष में किया गया, संविधान और मानवाधिकार के नियमों की खुलेआम उल्लंघन हुआ कर्मचारी और उनकी पत्नी के साथ रेल प्रशासन द्वारा स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर बर्बरता की गई। जो किसी भी सभ्य समाज और निष्पक्ष प्रशासन के मुंह पर एक तमाचा है।

सत्ता का मद: जूनियर्स के हक पर डकैती।

बक्सर जिले के ब्रह्मपुर ब्लॉक के अरियावां गांव के मूल निवासी जैश कुमार अपनी काली कमाई और क्षेत्रीय रसूख के नशे में इस कदर मदहोश हैं कि वे नियमों को अपनी जेब में लेकर चलते हैं। वर्तमान में प्लांट डिपो (Plant Depot) में कार्यरत कुछ जूनियर इंजीनियरों (JEs) का हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और अन्य न्यायसंगत भत्ते अवैध रूप से रोक कर रखे गए हैं। आखिर ये भत्ते क्यों रोके गए हैं? यह बात रेल महकमे का हर कर्मचारी और अधिकारी दबी जुबान से जानता है। अपनी बात न मानने वाले या भ्रष्टाचार के आगे न झुकने वाले ईमानदार कर्मचारियों को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ना ही अब इस तंत्र का मुख्य हथियार बन चुका है।

सिंडिकेट का खेल: कोर्ट केस के बावजूद गुपचुप प्रमोशन और ट्रांसफर का घालमेल!

जैश कुमार के काले कारनामों की फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। चंदौली न्यायालय (Chandauli Court) में इनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज होने के बावजूद, रेल नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए इन्हें गुपचुप तरीके से मुख्यालय स्थानांतरित कर दिया गया और ‘प्रमोशन’ (पदोन्नति) की रेवड़ी से नवाजा गया। जबकि नियमानुसार किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर कोर्ट केस या अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित होने पर प्रमोशन रोक दिया जाता है। और अगर प्रमोशन नहीं रोका जाना हो तो, की गई शिकायत की उचित जांच के बाद ही प्रमोशन दिया जाना चाहिए था परंतु उच्च स्तर पर शिकायत तो हुई लेकिन शिकायत की जांच जिनको सौंपी गई वह मुख्यालय (हाजीपुर) में बैठे थे जिन पर पूरी तरह से जैश कुमार का कैश और लोकैलिटी का तैश हावी था और स्वयं दोषी से ही जाँच करने का आदेश हुआ। जैश कुमार ने यह रिपोर्ट बनाकर भेजी की उक्त दिनांक (24-06-2025) को ऐसी कोई भी घटना हुई नहीं थी अतः जांच को बंद किया जाता है अर्थात ऐसा व्यक्ति जो स्वयं दोषी है उसी को अपने केस में ही न्यायाधीश बनाकर बैठा दिया गया और उसी के आधार पर सारी निर्णय लेकर मामले को रफादफा कर दिया गया। लेकिन यह अकेले मुमकिन कहां था इसलिए इस खेल में जैश कुमार और उनके मुख्य सहयोगियों—डीआरएम डीडीयू (DRM DDU) तथा अमन कुमार (DEE/OP/DDU), तथा हाजीपुर के कुछ भ्रष्ट अधिकारी ने पूरा सहयोग दिया।

जैश और अमन की DDU से दिल्लगी !

एक ने 15 महीने तक तबादला रुकवाया, दूसरे ने प्रमोशन के बाद फिर DDU में वापसी कर ली—आखिर DDU से ऐसी कैसी दिल्लगी?
पूर्व मध्य रेलवे में इन दिनों दो नामों को लेकर चर्चाएं तेज हैं—जैश कुमार और अमन कुमार। आरोपों और चर्चाओं को यदि एक तरफ रखकर घटनाक्रम को देखा जाए तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है कि दोनों ही अधिकारियों का DDU से मोह किसी भी नियम-कायदे से बड़ा नजर आता है।
अमन कुमार ने करीब 15 महीने तक अपना स्थानांतरण रुकवाकर रखा और अंततः कथित प्रभाव और रिश्वत के दम अपना स्थानांतरण निरस्त कराने में सफल रहा। वहीं दूसरे अधिकारी जैश कुमार के बारे में आरोप है कि वे केवल पदोन्नति प्राप्त करने के लिए DDU से हाजीपुर गए और पदोन्नति हासिल करने के बाद फिर DDU में अपनी पोस्टिंग करा लाए।

यानी कहानी का सार यही है—

जाना भी है तो थोड़ी देर के लिए, प्रमोशन भी चाहिए तो घर के पास, और आखिर में लौटना भी DDU ही है!
सवाल यह है कि क्या UPSC और DoPT के नियम सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू होते हैं? अगर नियम कहते हैं कि प्रशासनिक जरूरत के अनुसार अधिकारी कहीं भी पदस्थापित हो सकते हैं, तो फिर बार-बार मनचाही जगह पर पोस्टिंग हासिल करने का रास्ता आखिर कैसे खुल जाता है? कहीं इस सिंडिकेट का मुख्य द्वार दिल्ली में तो नहीं खुलता।

एक ओर आम रेलकर्मी का स्थानांतरण होने पर उसे परिवार, बच्चों की पढ़ाई और आर्थिक परेशानियों के बावजूद आदेश का पालन करना पड़ता है। दूसरी ओर यदि प्रभावशाली अधिकारियों के लिए स्थानांतरण और पदस्थापन केवल “आना-जाना और फिर वापस आ जाना” बन जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।

चर्चा यह भी है कि एक का गृह क्षेत्र गया और दूसरे का बक्सर है। ऐसे में कर्मचारियों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या DDU और आसपास का क्षेत्र इन अधिकारियों के लिए सिर्फ एक पोस्टिंग नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार करने का “स्थायी पसंदीदा क्षेत्र” बन गया है?
बेशक, इन आरोपों और चर्चाओं की वास्तविकता का निर्धारण दस्तावेज और निष्पक्ष जांच ही कर सकती है। लेकिन रेलवे प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित अधिकारियों के स्थानांतरण रोकने, रद्द करने और पदोन्नति के बाद पुनः DDU में पदस्थापन के निर्णय किन नियमों और प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर लिए गए।

क्या सो रहा है रेल मंत्रालय?

यह पूरा घटनाक्रम दिल को झकझोर देने वाला और ईमानदार कर्मचारियों के आत्मसम्मान को कुचलने वाला है। डीडीयू रेल मंडल में जो चल रहा है, वह प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक डकैती है। जहां ट्रांसफर-पोस्टिंग और प्रमोशन की नीतियां केवल ‘कैश और रसूख’ देखकर तय हो रही हैं, वहां आम रेल कर्मचारी खुद को असुरक्षित और लाचार महसूस कर रहा है।
सवाल यह उठता है कि क्या हाजीपुर मुख्यालय और रेलवे बोर्ड के सतर्कता विभाग (Vigilance) की आंखें इस अंधेरगर्दी पर बंद हैं? चंदौली कोर्ट में केस होने के बावजूद एक दागी अधिकारी को मलाईदार पोस्टिंग और प्रमोशन का इनाम देकर रेलवे क्या संदेश देना चाहती है? अगर इस तानाशाही और सिंडिकेट पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो डीडीयू मंडल में रेल के नियम पूरी तरह क्रैश हो जाएंगे और सिर्फ बचेगा—जैश का कैश और उसकी लोकलिटी गुंडागर्दी का तैश!

Leave a Comment

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *