ECR : क्या दानापुर रेल प्रशासन की शह पर चल रहा है ‘पोस्टरवार’! भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाज को दबाने का खेल उजागर

ECR : क्या दानापुर रेल प्रशासन की शह पर चल रहा है ‘पोस्टरवार’! भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाज को दबाने का खेल उजागर
दानापुर कमांडेंट और डीआरएम

दानापुर रेल मंडल कार्यालय में चस्पा बेनामी ‘पोस्टरवार’ ने प्रशासनिक तंत्र पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर आवाज उठाने वाले को निशाना बनाने वाले इस अनाधिकृत पोस्टर का अति-सुरक्षित परिसर में टंगे रहना सीधे तौर पर रेल प्रशासन की मूक सहमति और गहरी साजिश की ओर इशारा करता है.

दानापुर. दानापुर रेलमंडल के डिवीजनल कार्यालय की दीवार पर हाल ही में चस्पा किए गए एक अज्ञात पोस्टर ने रेल महकमे से लेकर कर्मचारी संगठनों तक में खलबली मचा दी है. “Rail Well Wishers” के छद्म नाम से चिपकाए गए इस पोस्टर में रेलवे कर्मचारियों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाने वाले कार्यकर्ता रणजीत मिश्र के खिलाफ बिजली बिल, रेल आवास आवंटन, अस्पताल सुविधाओं के अनुचित लाभ और परिजनों से जुड़े गंभीर आरोप मढ़े गए हैं.

हालांकि, ऊपरी तौर पर व्यक्तिगत आरोपों का पुलिंदा दिखने वाला यह पोस्टर वार अब एक बड़े प्रशासनिक घोटाले और साजिश की ओर इशारा कर रहा है. रेलवे परिसर जैसी अति-सुरक्षित और नियंत्रित सरकारी संपत्ति पर बिना किसी आधिकारिक अनुमति के महीनों से लगा पोस्टर सीधे तौर पर रेल प्रशासन की कार्यशैली, निष्पक्षता और मूक सहमति पर तीखे सवाल खड़े करता है.

सरकारी संपत्ति पर अनाधिकृत पोस्टर, प्रशासनिक लापरवाही या सुनियोजित सहयोग ?

रेलवे परिसर और प्रशासनिक भवनों की दीवारें न तो किसी की निजी जागीर हैं और न ही सार्वजनिक इश्तिहारबाजी का जरिया. सवाल यह उठता है कि:

  • बिना अनुमति पोस्टर कैसे लगा? रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और स्थानीय रेल प्रशासन की 24 घंटे मौजूदगी के बावजूद यह पोस्टर कार्यालय की दीवार तक कैसे पहुंचा और इतने लंबे समय से वहां कैसे मौजूद है?
  • हटाया क्यों नहीं गया? रेलवे नियमों के अनुसार परिसर में किसी भी प्रकार का अनाधिकृत बैनर, पोस्टर या प्रचार सामग्री लगाना कानूनन संज्ञेय अपराध है. इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? या फिर इसे जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है?

स्थानीय कर्मचारियों में यह चर्चा आम है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहने वाले कार्यकर्ताओं को घेरने के लिए प्रशासन का एक वर्ग परदे के पीछे से इस पोस्टर वार को संरक्षण दे रहा है.

डीआरएम, सीनियर डीसीएम और सीनियर कमांडेंट की भूमिका पर सवाल

दानापुर रेल मंडल में प्रशासनिक नियंत्रण की कमान मंडल रेल प्रबंधक (DRM), परिचालन व वाणिज्यिक निगरानी सीनियर डीसीएम (Sr. DCM) और परिसर की सुरक्षा का जिम्मा सीनियर कमांडेंट (Sr. Commandant, RPF) के हाथों में होता है. ऐसे शीर्ष अधिकारियों की नाक के नीचे इस तरह के विवादित और बेनाम पोस्टरों का लगातार टंगे रहना इनके प्रशासनिक दायित्वों पर गहरा धब्बा है.

  • संज्ञान न लेने का कारण क्या? यदि पोस्टर में लगाए गए आरोप सही हैं, तो रेल प्रशासन ने अब तक इसकी आधिकारिक या विभागीय जांच के आदेश क्यों नहीं दिए ?
  • कार्रवाई से दूरी क्यों ? यदि आरोप बेबुनियाद या दुर्भावनापूर्ण हैं, तो सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग कर माहौल बिगाड़ने वाले अज्ञात तत्वों के खिलाफ RPF या जीआरपी में प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई गई ?

प्रशासन का यह मौन रवैया इस आशंका को बल देता है कि शीर्ष अधिकारी निष्पक्ष जांच करने के बजाय, आरोप-प्रत्यारोप के इस कीचड़ में खुद को बचाते हुए अप्रत्यक्ष साझीदार की भूमिका निभा रहे हैं.

‘काउंटर नैरेटिव’ का खेल, भ्रष्टाचार के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश

रणजीत मिश्र लंबे समय से पूर्व मध्य रेलवे (ECR) और दानापुर मंडल में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार, निविदाओं की अनियमितताओं, अधिकारियों के मनमाने रवैये और कर्मचारियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं. ऐसे में अचानक उनके खिलाफ बेनाम पोस्टर सार्वजनिक होना महज एक संयोग नहीं हो सकता. यह सीधे तौर पर एक “काउंटर नैरेटिव” (Counter Narrative) गढ़ने का प्रयास प्रतीत होता है:

  • उद्देश्य: मुख्य भ्रष्टाचारियों और व्यवस्थागत खामियों पर उठ रहे सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल उठाने वाले व्यक्ति के चरित्र पर ही कीचड़ उछाल देना.
  • रणनीति: जब किसी व्हिसलब्लोअर को दबाना आसान नहीं होता, तो उसे आरोपों के जाल में उलझाकर आम कर्मचारियों की नजरों में संदेहास्पद बना दिया जाता है.

बेनामी आरोपों के पीछे का डर, शिकायतकर्ता सामने क्यों नहीं आता?

पोस्टर पर केवल “Rail Well Wishers” लिखा होना ही इसके सबसे बड़े फर्जीवाड़े को उजागर करता है. यदि आरोप लगाने वाले के पास पुख्ता दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद हैं, तो वह सक्षम प्राधिकारी (CVC, CBI या सतर्कता विभाग) के समक्ष प्रस्तुत होने से क्यों डर रहा है?

  • क्या पहचान छिपाकर पोस्टर लगाने वाला खुद किसी बड़े घोटाले में लिप्त है?
  • क्या हाल के दिनों में उजागर हुए भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ ने ही बौखलाहट में यह कदम उठाया है?

इन तीनों ही संभावनाओं की गहराई से जांच होना अनिवार्य है, क्योंकि बेनामी आरोपों के आधार पर सार्वजनिक रूप से किसी का चरित्र हनन करना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है.

यहां कानून और नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं?

रेलवे परिसर में इस प्रकार का कृत्य कई गंभीर कानूनी और प्रशासनिक उल्लंघनों के दायरे में आता है, रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 145 व 147: रेलवे संपत्ति में अनाधिकृत प्रवेश करना, उपद्रव मचाना या संपत्ति को विरूपित करना दंडनीय अपराध है.

  • संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम: बिना लिखित अनुमति के किसी भी सरकारी भवन या दीवार पर पोस्टर चिपकाना पूरी तरह अवैध है.
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मानहानि (Defamation): किसी व्यक्ति की साख को नुकसान पहुंचाने के इरादे से बिना प्रमाण के सार्वजनिक पोस्टर लगाना आपराधिक मानहानि की श्रेणी में आता है.
  • सीवीसी (CVC) दिशानिर्देश: केंद्रीय सतर्कता आयोग के स्पष्ट निर्देश हैं कि बेनामी शिकायतों या प्रचारों के आधार पर किसी को निशाना बनाने के बजाय पारदर्शी जांच की जानी चाहिए.

फैसला पोस्टर नहीं, निष्पक्ष जांच सवालों के घेरे में 

दानापुर रेलवे कार्यालय की दीवार पर टंगा यह पोस्टर अब केवल आरोपों का पत्र नहीं रहा, बल्कि यह रेल प्रशासन की साख और निष्पक्षता की परीक्षा बन चुका है. बिना किसी आदेश या निर्देश के इस पोस्टर का वहां बने रहना प्रशासनिक शह की ओर इशारा करता है.

रेलवे प्रशासन को तुरंत इस पोस्टर को हटाकर, इसे लगाने वाले असामाजिक तत्वों की सीसीटीवी फुटेज से पहचान करनी चाहिए. साथ ही, पोस्टर में दर्ज आरोपों और इसे लगाने के पीछे की साजिश, दोनों पहलुओं की उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि सत्य सामने आ सके.

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