पटना: साहब रिटायर्ड हो गये थे, सो मैडम भी। साहब को इस बात की समझ तो थी, पर शायद मैडम को बिलकुल भी नहीं। साहब इस बार ,पहली बार, भारी भरकम मैडम और बैगज के साथ अकेले रेल यात्रा पर थे। साथ में कोई लाव – लश्कर या अर्दली भी नहीं था। ट्रेन में पहले जैसी आव – भगत न होते देख मैडम पहले से ही काफी कुढ़ी हुई थी, साहेब को सरेआम लथेर रही थी, फिर उपर से यह वाकया भी कुछ कम नहीं था, दोनों के फ्रस्ट्रेशन को बढ़ाने के लिए।
दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन : रात्रि के दो बजे ,
गाडी से भारी – भरकम मैडम और बैगज को उतारने में दुबले -पतले साहब को आधी रात में पसीना आ गया पर मैडम अपना वैनिटी बैग और हैण्ड बैग सभालने में ही परेशान थी। गाडी से उतरते ही साहब ने चारो तरफ नज़र दौड़ायी , कोई रिसिव करने वाला नहीं था । साहब मन ही मन बुद – बुदा रहे थे , सबको फ़ोन तो कर दिया था, बता भी दिया था की किस गाडी से , किस कोच में आ रहे रहे हैं, फिर भी कोई नज़र नहीं आ रहा है, लगता है गाडी बिफोर टाइम आ गयी .या फिर दूसरे स्टेशन पर तो नहीं उतर गए है ?
उन्होंने कलाई घडी और स्टेशन नाम बोर्ड दोनों को देखा, दोनों अपनी – अपनी जगह सही थे। फिर गलत क्या था , जो उन्हें कोई दिख नहीं रहा था, उन्होंने यह भी चेक किया कि आँख पर चश्मा भी सही जगह पर लगा है या नहीं ।
तभी मैडम की व्यंग भरी बडबड़ाहट से उनका ध्यान टूटा , तुमसे से तो जिन्दगी में कुछ होने वाल नहीं है, देखो तुम्हारे डिपार्टमेंट के लोग रेलगाड़ी की तरह लेट लतीफ़ हैं, मैं तुम्हारी जगह होती तो उन्हें राजधानी की तरह राईट टाइम कर देती।
भारी भरकम सामान और गुस्सैल मैडम को देख कोई कुली भी पास नहीं आ रहा था । कुछ कूली उन्हें पहचानते भी थे कि साहब का सामान और मैडम को लेने के लिए विभाग का पूरा लाव –लश्कर भी आयेगा। कुछ को यह भी डर था कि शायद पैसा ही नहीं मिले, क्योंकि उनलोगों ने मैडम को पर्स में केवल पैसा भरते हुए देखा था, कभी निकालते हुए नहीं। सो ऐसा सोचकर भी वह अपने गुट को लेकर अलग हो गया।
पास में कुत्ते का एक जोड़ा भी एकाएक उन दोनों को देखकर सहम गया और दौड़कर किनारे हो लिया. पर, इस बार उन्हें दौड़ाने वाला कोई नहीं था । इससे पहले दोनों के आने के खबर से ही उन्हें भगाने के लिए ऐके -47 लेकर इंस्पेक्टर तक आ जाता था, इस बार लाठी वाला तोंदू सिपाही भी आस पास नज़र नहीं आ रहा था।
फिर मैडम के आदेश से साहब ने स्थानीय प्रबंधक श्री अग्रवाल को फ़ोन लगाया , इतनी रात फ़ोन सुनकर श्री अग्रवाल भी चिड – चिड़ा गये , क्योंकि अभी – अभी वह वर्तमान बड़े साहेब को विदा कर आये थे।फोन लगा, घंटी बजी, पर उधर से केवल हेल्लो – हेल्लो, कौन बोल रहा है , की आवाज आई और फ़ोन काट दिया, काटते – काटते , यह भी बोल दिया कि साले आधी रात और भारी बरसात में भी फ़ोन करने का समय है क्या ? साहब इधर से बोलते ही रह गए कि अरे मैं श्रीवास्तव बोल रहा हूँ । अरे सुनो तो ….।
साहब को डांटते हुए मैडम ने कहा किसी और को नंबर लगा दिया होगा , लाओ मैं मिसेज अग्रवाल को फ़ोन लगाती हूँ। फ़ोन लगाते ही उनका भी बचा- खुचा हुआ स्वागत पूरा हो गया , उधर से आवाज सुनाई दी, —ली, -मिनी , अभी भी अपने को लाट साहब समझती है, और फ़ोन काट दिया।
साहब निराशा से भरे थे और मैडम गुस्से से। दोनों बड-बड़ा रहे थे, जब मैं पोस्ट पर था तो, साले सब लाइन लगाकर खड़े रहते थे और कुत्ते की तरह दुम हिलाते थे। एक को इशारा करो, दस दौड़ता था । इस कमीने अग्रवाल को मैंने ही ––M बनाया था, साला अब फ़ोन भी नहीं उठाता है।
उधर अग्रवाल दम्पति भी बड-बड़ा रहे थे , साला- — मीना जब पोस्ट पर था तो ऐसे दिखाता था कि जैसे भगवान है, अकड़ दिखाता था. जब भी बोलता था,तो जहर उगलता था | सबको कुत्ता कह कर गरियाता था । साला- — मीना मांस तो नोचता ही था , वो तो हड्डी भी चूस लेती थी। बिना पैसा लिए किसी का काम भी नहीं करता था । सीनियर होते हुए भी जब तक मुझसे पैसा नहीं लिया, तब तक आर्डर पर साइन नहीं किया, चुड़ैल को गिफ्ट दिया अलग से ।
श्री अग्रवाल और प्लेटफॉर्म का कुत्ता उनलोगों की बड-बड़ाहट सुन रहा था । आदमी के साथ रहते रहते वह भी सभ्य हो गया था , बोला , साले – कमीने , ये आदमी लोग हमसे भी गए गुजरे हैं, फिर बात- बात में हमारी जाति “ कुत्ते “ का नाम बार- बार क्यों लेते है ?
क्या जवाब है , किसी के पास ?






शानदार व्यंग
यह लेख व्यंग्य के माध्यम से सिस्टम की असल तस्वीर दिखाता है—जहाँ पद है, संवेदनशीलता नहीं; आदेश है, ज़िम्मेदारी नहीं। आम कर्मचारी सिर्फ मोहरा बनकर रह जाता है।
भाषा सटीक है और कटाक्ष तीखा। ऐसा लेख व्यवस्था से सवाल पूछता है, जवाब नहीं माँगता।