कौन सुनता है अफशाना ,
सब मगन है मयखाने में ।
हटा दी गयी है जहाँगीरी घंटी,
खलल न पड़े- पैमाने में।
ऊंची हैं दीवारें, कैसे पहुंचे मेरी आवाज,
पहुंचती तो होगी ही ,पर सुनता नहीं शहंशाह,
सुनता शहंशाह – केवल सुरीली साज़ !!
चढ़ते सीढ़ियों पर चढ़ावा देकर,
मिलने न देता पहरेदार-रोबदार!
कुछ अर्ज करूँ,
उसके पहले ही सुनता –“ खबरदार“ !
किससे कहूं , कैसे कहूँ,
बाहर न निकलता – हुज़ूर- ए- दरबार !!
कोशिश की, दिखाऊं आईना,
बताया गया – मेरी औकाद ,
चिल्ला रहा हूँ – नक्कारखाने में ,
न जाने ,कौन सुने, कब सुने, मेरी फ़रियाद !!
*एक आम ECR कर्मचारी की वेदना । जहां सुरक्षा पहरेदार लगाकर आम कर्मचारियों को अपने अधिकारियों से मिलने से
रोका जाता है। विस्तृत कहानी अगले भाग में…





