पटना: रेलवे के ग्रुप – बी अधिकारी संगठन के रीढ हैं। ग्रुप ए के कनिष्ठ अधिकारियों की तुलना में उन्हें फील्ड के काम की बारिकियों का, तकनीकी ज्ञान का व्यावहारिक पटल पर क्रियान्वयन अनुभव तो होता ही है साथ ही साथ वर्षों से फील्ड में काम करने का प्रशासनिक अनुभव भी होता है।
एक तरफ जहां ग्रुप- ए के ज्यादातर अधिकारी, अपने अनुभवहीनता एवं ग्रुप -ए में होने के दंभ के कारण Buerocratic ढ़ंग से काम करते हैं, भले ही वह आरक्षण का लाभ ले अधिकारी बने हों, कर्मचारियों से टेढ़े मुँह बात करते हैं, औद्योगिक माहौल को खराब करते है,वहीँ ग्रुप-बी अधिकारी- रेलवे प्रशासन और कर्मियों के बीच एक कड़ी का काम भी करता है, जिससे कि प्रशासन एवं कर्मचारियों के बीच औद्योगिक संबंध मजबूत बना रहता है।
अधिकांश मामलों में उनकी उत्पादकता ग्रुप-ए के अधिकारियों की तुलना में बेहतर सिद्ध हुई है। पर, एक कहावत है न- अंधा बांटे रेवड़ी , अपने झोली में डाल। सो, प्रशंसा और पारितोषिक भी उन्हें ही मिलता है।

आज की तारीख में हालात यह है कि ग्रुप-बी के अधिकारी वर्षों से सहायक अधिकारी के पद पर पड़े हुये हैं, वही ग्रुप- ए अधिकारी नियत समय में पदोन्नति पर पदोन्नती पाकर खजूर के पेड़ की तरह और भी टेढ़ा और रुखड़ हो जाता है, क्योंकि पदोन्नति का नियम ग्रुप- ए के लिए , ग्रुप- ए के द्वारा ही बनाया जाता है और इसमें घोर पक्षपात किया जाता रहा है।
वर्ष 2019 तक पदोन्नति के लिए नियमावली थी उसे पूर्णतः बदलकर ग्रुप-बी के Junior स्केल अधिकारियों का Senior स्केल में प्रमोशन बिल्कुल ही बंद कर दिया गया एवं Senior स्केल के पद को पूर्णतः ग्रुप- ए के अधिकारियों के लिये आरक्षित कर दिया गया तथा साथ-साथ उस पद की संख्या में कटौती कर दी गयी। कटौती किए गए पदों को SAG/HAG रैंक / Chief, Principal चीफ रैंक में बदल दिया गया. इस व्यवस्था के कारण रेलवे में Senior स्केल पद से ज्यादा Cheif रैंक के पद ज्यादा हो गया जैसे “भेड़ से ज्यादा गड़ेरिया”,

इस कारण ग्रुप-बी के अधिकारियों का प्रमोशन ठप हो गया और 15 साल से ऊपर तक एक ही पद पर काम करने को मजबूर हो गये और कई तो प्रमोशन की आशा लिए रिटायर भी हो लिये।
ऐसा नहीं कि इससे केवल ग्रुप-बी अधिकारी ही प्रभावित हुए बल्कि रेलवे का काम भी प्रभावित होने लग गया और रेलवे के छोटे मूल्य के टेन्डर के काम रुकने लगे जिसे केवल सीनियर स्केल अधिकारी ही करते थे। व्यवस्था चरमराने लगी तो रेलवे की भी नींद टूटी और एक साल के लिए ad-hoc promotion की अन्तरिम व्यवस्था की स्वीकृती DOPT से ली गई परंतु इसमें भी ग्रुप-ए के अधिकारियों ने खेला कर दिया।

खेला यह है कि 2019 के पूर्व की व्यवस्था में (Gr.A और Gr.B के बीच Sr.Scale में प्रमोशन की वरीयता) का हेर- फेर कर दिया, जिससे तीन साल सेवा वाले ग्रुप-ए को छह साल सेवा वाले ग्रुप-बी के ऊपर प्राथमिकता दी गई है, जबकि पूर्व की व्यवस्था में छह साल वाले ग्रुप-बी अधिकारियों को चार साल वाले ग्रुप-ए अधिकारी के ऊपर प्राथमिकता थी।
स्वाभाविक है- यह खेल DOPT ने नहीं किया होगा। यह खेला रेलवे बोर्ड के कार्मिक विभाग के द्वारा किया गया लगता है क्योंकि DOPT का काम Ad-hoc प्रमोशन का सैद्धांतिक सहमति देना था। अब, कार्मिक तो कार्मिक है- खेला करना इनका मौलिक स्वभाव है। कहावत है- चोर चोरी से जाए,तुम्बा फेरी से न जाये। यह एक अलग से जांच-पड़ताल का विषय है, उम्मीद है- जगे हुए लोग इसकी जाँच जरूर करेंगे।
अब, कहानी की मूल आत्मा में आते हैं, जिसमें ECR कार्मिक के अकर्मण्यता को प्रदर्शित करती है। रेलवे बोर्ड द्वारा दिनाँक 27.01.2026 को Gr.B Junior scale अधिकारियों का Sr. Scale में Adhoc प्रमोशन का आदेश जारी किया गया था। इसके ठीक तीसरे दिन ही मध्य रेलवे ने अपने कार्मिक विभाग के Gr.B के APOs रैंक के अधिकारियों का DPO रैंक में promotion का आदेश जारी कर दिया. देखा- देखी अन्य दो Railway के द्वारा भी कार्मिक विभाग के अधिकारियों के लिए ऐसा ही आदेश जारी कर दिया।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या उस ज़ोन के कार्मिक विभाग को पहले से पता था कि बोर्ड से ऐसा आदेश जारी होने वाला है और उस ज़ोन के कार्मिक ने पहले से ही promotion के लिए DPC का process पूरा कर लिया था जबकि DPC की प्रकिया में APAR, DA & Vigilance clearances आदि की प्रक्रियाओं से गुजरना होता है, तो क्या इतनी तेजी केवल कार्मिक विभाग के लिए होती है, – या अन्य विभागों के लिए भी?
यह भी एक जाँच का बिंदु है क्योंकि दो सप्ताह होने के बाद भी उस सबसे तेज रेलवे के द्वारा अन्य विभाग के समान रैंक के अधिकारियों का प्रमोशन आदेश जारी नहीं किया गया है।
सबसे गया- गुजरा ECR का अकर्मण्य कार्मिक विभाग, जो न अपने विभाग के अधिकारियों का कल्याण कर सका न ही अन्य विभागों के ग्रुप-बी सहायक अधिकारीयों का। हो सकता है, अंदरखाने में सौदेबाज़ी चल रही हो, प्रमोशन देने के लिए मोल- भाव चल रहा हो क्योंकि लाभान्वित होने वालों का रुतबा के साथ-साथ वेतन भी बढ़ेगा, और इस बढ़ोत्तरी में कार्मिक के कर्मी का हक न बने, ऐसा हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वसूली यहां की स्थापित परंपरा है। कार्मिक के इस Trade Deal में Vaccancy छुपाया जाएगा,किसी का APAR गुम कर दिया जाएगा, किसी का अन्य Clearances पेंडिंग दिखाया जाएगा, DPC गठन को लटकाया जाएगा , आदि आदि। फिर Tariff का Rate बताया जाएगा। तब कहीं जाकर प्रक्रिया प्रारम्भ होगा।

अद्यतन प्राप्त जानकारी के अनुसार कार्मिक विभाग अभी फेंका- फेंकी का खेला खेल रहा है। इस अकर्मण्य विभाग की ज़िद है संबंधित Executive Department के प्रमुख आदि के द्वारा उनको विभागीय नोट के माध्यम से आग्रह प्राप्त होने के उपरांत ही प्रमोशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा जबकि कुछ Executive Department के प्रमुख का मानना है कि promotion की प्रक्रिया को कार्मिक के द्वारा स्वतः प्रारम्भ किया जाना चाहिए, क्योंकि अधिकारीयों की वरियता सूची, cadre strenth,वर्तमान रिक्तियों का रख रखाब कार्मिक के द्वारा ही किया जाता रहा है।
कार्मिक और Executives के बीच इस रस्साकशी में अधिकारी दो पाटों के बीच पीस रहे है और छोटी- छोटी बातों पर मीटिंग लेने वाले AGM महोदय को इस विषय से कुछ लेना-देना है नहीं।
देखते हैं, कार्मिक के इस अकर्मण्यता पर रेलवे प्रशासन का चाबुक उठता भी है कि नहीं। तब तक इंतजार करिए, सब्र के साथ – रिटायर होने तक, क्योंकि कार्मिक विभाग का मूल मंत्र है नोट दिजियेगा तो नोट पुटअप होगा!





