दानापुर: रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है, लेकिन दानापुर रेल मंडल में सीनियर डीईई (ऑपरेशन) शिशिर नगरिया ने इसे अपनी व्यक्तिगत ‘कमाई की लाइफलाइन’ बना लिया है। यहां नियम और कायदे वैसे ही नाचते हैं, जैसे हुजूर के हाथ में हरे-नीले नोट नाचते हैं। ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’ के कहावत को चरितार्थ होते देखकर पूरी दानापुर नगरी आज शर्मसार है, सिवाय साहब और उनके खास सिपहसालारों के।
रेलवे बोर्ड का ‘वीकेंड मोड’ और नगरिया की चांदी:- पिछले साल जब डीडीयू (DDU) मंडल में चीफ लोको इंस्पेक्टर (CLI) की पोस्टिंग के नाम पर करोड़ों का ‘कैश-ऑन-डिलीवरी’ घोटाला फूटा था, तो दिल्ली की कुर्सियों में भी कंपन हुआ था। तब कुंभकर्ण के खानदान से ताल्लुक रखने वाला रेलवे बोर्ड एकाएक जागा। अपनी बची-खुची इज्जत बचाने के लिए बोर्ड ने सीएलआई चयन की चाबी अपने पास रख ली।लेकिन कहते हैं न, ‘कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती और भ्रष्ट अधिकारी कभी हराम की कमाई नहीं छोड़ता।’
शिशिर नगरिया जैसे सूरमा वर्षों से रेल मंत्रालय और बड़े आकाओं की ऐसी ‘विशेष असीम अनुकंपा’ के पात्र हैं कि इन्हें एक ही ज़ोन या एक ही डिवीज़न में परमानेंट एड्रेस मिल गया है। जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए बस इनका नेमप्लेट बदल दिया जाता है—कभी साहब सीनियर डीईई (TRD) की मलाई काटते हैं, तो कभी सीनियर डीईई (ऑपरेशन) की मलाई चाटते हैं। जब आकाओं का वरदहस्त हो, तो साहब के लिए ‘सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का’ वाली बात नहीं, बल्कि ‘सैयां ही कोतवाल हैं, तो पूरा थाना ही अपना है’ वाली स्थिति हो जाती है।
‘क्रू काउंसिलिंग’: अयोग्यता को योग्यता बनाने का जादुई टूलनियम कहता है कि सीएलआई की नियुक्ति अब सिर्फ रेलवे बोर्ड करेगा। लेकिन बोर्ड तो अपनी ऐतिहासिक आदत के अनुसार एक बार अंगड़ाई लेकर फिर से ‘स्लीप मोड’ में जा चुका है। अब जब वह महीनों बाद जागेगा, तो ज़ाहिर है उसे भारी भूख लगेगी। उस भूख को शांत करने के लिए दिल्ली तक ‘भोग’ पहुंचाने की जिम्मेदारी शिशिर नगरिया जैसे वफादार प्यादों ने अपने कंधों पर ले ली है।इस महान कार्य के लिए दानापुर में एक नया प्रशासनिक पाखंड रचा गया है, जिसका नाम है ‘क्रू काउंसिलिंग’ (Crew Counselling)।

सीएलआई की कमी का रोना रोकर, खाली पदों को भरने के नाम पर एक ऐसा बैकडोर चोर-रास्ता बनाया गया है, जहां केवल नोटों की वजनदारी देखी जा रही है। इस जादुई रास्ते से उन लोगों को सीएलआई की लाल बत्ती बांटी जा रही है, जो पहले ही अपनी अयोग्यता के कारण सिलेक्शन लिस्ट से लात मारकर बाहर किए जा चुके हैं। यहां न तो किसी सीनियर की इज्जत बची है, न जूनियर की मर्यादा; यहां तो केवल गांधी जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर (करेंसी) ही एकमात्र योग्यता पैमाना बन चुकी है।
हवेली के दरबारी: अनुभव शून्य, वफादारी फुल!:- साहब की दानापुर वाली ‘हवेली’ में हाजिरी लगाने वाले कुछ ऐसे अनमोल रत्न हैं, जिनका रेल पटरी पर दौड़ने का अनुभव भले ही न के बराबर हो, लेकिन साहब के चरणों में साष्टांग दंडवत करने का अनुभव पीएचडी स्तर का है। इन चमकीले सितारों में शामिल हैं:
जितेन्द्र कुमार भक्ता (LPP/RGD) – अनुभव कम, साहब की भक्ति ज्यादा।
प्रवीण मधुकर (LPP/DNR) – सीनियर को ठेंगा दिखाकर साहब के खास दलाल।
मनीष कुमार (LPP/झाझा) – जूनियर होकर भी सीनियर का बॉस बनने को बेताब। एवम् अन्य।
ये वो महानुभाव हैं जो योग्यता की सीढ़ी से नहीं, बल्कि साहब की हवेली के गुप्त रास्ते से चढ़कर सीनियर कर्मचारियों के ‘माई-बाप’ बनने का ख्वाब देख रहे हैं। इससे पहले भी पंकज कुमार (LPG DNR) को सीधे मलाईदार कुर्सी पर बिठाने का फरमान लगभग छप ही चुका था। लेकिन जागरूक और सजग कर्मचारियों के कड़े विरोध के बाद प्रशासन को बैकफुट पर आना पड़ा और जब इस बात पर कि एक एलपीजी (LPG) अपने से सालों सीनियर कर्मचारियों की काउंसलिंग कैसे कर सकता है, तो साहब को अपनी थूकी हुई चिट्ठी चाटनी पड़ी और आदेश वापस लेना पड़ा।
नपुंसक शेर और भेड़ियों का राज:- आज दानापुर रेल मंडल पूरी तरह से एक अंधेर नगरी बन चुका है। रेलवे बोर्ड को इस जंगल का ‘शेर’ होना चाहिए था, लेकिन जब शेर ही नपुंसक होकर गुफा में सो जाए, तो शिशिर नगरिया जैसे लकड़बग्घे और भेड़िए पूरे सिस्टम को नोच-नोच कर खाने लगते हैं। दानापुर में फिलहाल न तो कोई रेल का नियम बचा है और न ही संविधान का कायदा; यहां सिर्फ और सिर्फ नगरिया का ‘वसूली तंत्र’ चल रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या रेलवे बोर्ड फिर एक बार अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा? या फिर सब कुछ देखने-सुनने के बाद भी मौन साधे रहेगा?
रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है। लेकिन यदि व्यवस्था में नियमों की जगह प्रभाव, योग्यता की जगह पहुंच और पारदर्शिता की जगह कथित लेन-देन हावी होने लगे, तो जंगल और व्यवस्था के बीच का अंतर धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
कहा जाता है कि जंगल में भी एक शेर होता है, जिसकी दहाड़ से व्यवस्था कायम रहती है। पर यदि वही शेर मौन हो जाए, तो भेड़ियों का साहस बढ़ना स्वाभाविक है।
अब निगाहें रेलवे बोर्ड पर हैं। क्या वह यह संदेश देगा कि भारतीय रेल में कानून और नियम सर्वोपरि हैं, या फिर आरोपों और चर्चाओं का यह सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा?
क्योंकि अंततः सवाल किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जिस पर लाखों रेलकर्मी और करोड़ों यात्री भरोसा करते हैं।





