ECR: पूर्व मध्य रेल का लेखा विभाग—जातिगत भेदभाव, ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल और भ्रष्टाचार के आरोपों के साये में !

ECR: पूर्व मध्य रेल का लेखा विभाग—जातिगत भेदभाव, ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल और भ्रष्टाचार के आरोपों के साये में !
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पटना: पूर्व मध्य रेलवे का लेखा विभाग इन दिनों अपने मूल वित्तीय दायित्वों से अधिक कथित भ्रष्टाचार, ट्रांसफर-पोस्टिंग में मनमानी, जातिगत पक्षपात और कुछ अधिकारियों के बढ़ते प्रभाव को लेकर कर्मचारियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। विभाग के भीतर यह धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि यहां प्रशासनिक निर्णय नियमों से कम और प्रभाव, जाति तथा कथित आर्थिक लेन-देन के आधार पर अधिक लिए जा रहे हैं।

कर्मचारियों का आरोप है कि विभाग में वर्षों से जमे वर्तमान वित्त प्रमुख ने पूरे प्रशासनिक ढांचे को अपने प्रभाव में ले रखा है। सामान्य प्रशासन से लेकर व्यय अनुभाग तक सीमित अधिकारियों का ऐसा नेटवर्क तैयार किया गया है, जहां अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय कुछ चुनिंदा लोगों की सहमति से ही लिए जाते हैं। विभाग में राजीव रंजन की भूमिका को लेकर भी सबसे अधिक चर्चा है।

मुख्यालय हाजीपुर में कार्यरत कर्मचारियों के अनुसार, SAG और JAG स्तर के अधिकारी भी कई मामलों में राजीव रंजन के माध्यम से ही निर्देश प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि विभाग में उन्हें अनौपचारिक रूप से “सुपर पीएफए” कहा जाने लगा है। आरोप है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर संवेदनशील पदों पर तैनाती तक, लगभग हर महत्वपूर्ण निर्णय में उनकी निर्णायक भूमिका रहती है।

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हाल ही में एक अधिकारी को स्पाउस ग्राउंड के आधार पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय मंडल से धनबाद मंडल स्थानांतरित किया गया। कर्मचारियों का कहना है कि उक्त अधिकारी अपने पूरे सेवा काल में केवल एक बार मार्च 2025 में धनबाद से बाहर भेजे गए थे और मात्र सवा वर्ष बाद फिर उसी मंडल में वापस पहुंच गए। जबकि उनकी पत्नी रेलवे सेवा से कुछ ही महीनों में सेवानिवृत्त होने वाली हैं।

इसके विपरीत, समस्तीपुर में पिछले ढाई वर्षों से कार्यरत एक अधिकारी तथा सोनपुर के एक अन्य अधिकारी लगातार स्पाउस ग्राउंड पर स्थानांतरण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही। कर्मचारियों का आरोप है कि एक विशेष जाति से जुड़े अधिकारियों के मामलों में प्रशासन अधिक संवेदनशील दिखाई देता है, जबकि अन्य अधिकारियों के साथ भेदभाव किया जाता है।

जनवरी 2026 में महेंद्रू स्थित रेलवे निर्माण कार्यालय में सीबीआई की छापेमारी के दौरान बिल भुगतान के बदले कथित रिश्वतखोरी का मामला सामने आया था। उस समय व्यय अनुभाग में कार्यरत तीन वरिष्ठ अनुभाग अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ की थी और मामला न्यायालय में विचाराधीन बताया जाता है।

मार्च 2026 में महाप्रबंधक के हस्तक्षेप से इन अधिकारियों का दूर-दराज के मंडलों में स्थानांतरण किया गया। लेकिन कर्मचारियों के अनुसार, 25 मई 2026 को जारी आदेश में इन्हीं तीन अधिकारियों को मेडिकल ग्राउंड के आधार पर पुनः हाजीपुर और सोनपुर वापस पोस्ट कर दिया गया।

यहीं से कई सवाल खड़े होते हैं। यदि वास्तव में मेडिकल आधार था, तो किसी मेडिकल बोर्ड की अनुशंसा क्यों सार्वजनिक नहीं हुई? यदि गंभीर स्वास्थ्य समस्या थी, तो उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधाओं वाले पटना या दानापुर में क्यों नहीं भेजा गया? कर्मचारियों का दावा है कि इन अधिकारियों की वापसी पूर्व में दी गई “सेवाओं” का प्रतिफल है।

लेखा विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर सबसे गंभीर आरोप यही हैं कि यहां योग्यता या प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक जाति और कथित आर्थिक लेन-देन प्रभावी हो चुके हैं।
डीडीयू मंडल के परीक्षा प्रकरण के बाद हुए स्थानांतरण में भी कर्मचारियों का आरोप है कि एक विशेष वर्ग के अधिकारियों को पटना और दानापुर जैसे पसंदीदा स्थानों पर बनाए रखा गया, जबकि अन्य अधिकारियों को दूरस्थ मंडलों में भेज दिया गया। प्रशासनिक आधार पर हुए अधिकांश स्थानांतरण भी कथित रूप से सीमित वर्ग तक ही सिमट गए।

कर्मचारियों के अनुसार, सामान्य प्रशासन की जिम्मेदारी ऐसे अधिकारियों को सौंपी गई जिन्हें कुछ समय पहले कथित अनियमितताओं के कारण संवेदनशील पदों से हटाया गया था। कुछ ही महीनों बाद वही अधिकारी फिर महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों में लौट आए और पूरी व्यवस्था एक सीमित समूह के नियंत्रण में आ गई।

कर्मचारियों का कहना है कि महेंद्रू सीबीआई प्रकरण में अधिकांश बिल पहले से कार्यरत अधिकारी द्वारा पारित किए गए थे, लेकिन कार्रवाई का सबसे बड़ा असर उस अधिकारी पर पड़ा जिसने बाद में केवल एक बिल पास किया था। वहीं पहले से कार्यरत अधिकारी को उसी अनुभाग में बनाए रखा गया। इससे विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि लेखा विभाग का मूल उद्देश्य वित्तीय अनुशासन बनाए रखना है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में पूरा विभाग लगातार विवादों में घिरा हुआ है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि महाप्रबंधक के हस्तक्षेप से किए गए स्थानांतरण कुछ ही सप्ताह में बदल दिए जाते हैं, तो प्रशासनिक निर्णयों की विश्वसनीयता पर क्या असर पड़ता है?

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या रेलवे बोर्ड इन लगातार उठ रहे आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा होगी? क्या विभाग में जातिगत पक्षपात, प्रभावशाली अधिकारियों की भूमिका और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?

पूर्व मध्य रेलवे के लेखा विभाग को लेकर उठ रहे ये सवाल केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं।

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