अभियंत्रण पर किसका है नियंत्रण, महानिदेशक के सवाल उठाने के बावजूद एक ही जगह वर्षों से जमे हुए हैं कई अभियंता

अभियंत्रण पर किसका है नियंत्रण, महानिदेशक के सवाल उठाने के बावजूद एक ही जगह वर्षों से जमे हुए हैं कई अभियंता

हाजीपुर: रेलवे का अभियंत्रण विभाग जिस पर रेलवे की पटरियों की जिम्मेदारी है और वो अगर बेपटरी हो जाए तो क्या होगा वहीं होगा जो पूर्व मध्य रेलवे, हाजीपुर के मुख्यालय में हों रहा हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि पुरा का पुरा सिस्टम ही डिरेल हों चुका है। डिरेल इसलिए क्योंकि लम्बी अवधि तक एक ही जगह पदस्थापना पर महानिदेशक लेखा परीक्षा ने सवाल उठाया है फिर भी कोई कार्रवाई नहीं आखिर क्या कारण हो सकता हैं, विचारणीय है ।

महानिदेशक लेखा परीक्षा, हाजीपुर ने दिनांक 10.03.2024 के पत्र के माध्यम से अभियंत्रण विभाग के टीएसपी सेल और स्टोर में श्री ज्ञानेश कुमार कर्ण, वरीय प्रशाखा अभियंता,रेल पथ,31.08.2016 से ही मुख्यालय में पदस्थापित हैं। खैर ये तो सिर्फ आठ साल से ही मुख्यालय में मजा काट रहे हैं। मजा काटने वाले में दूसरा नाम श्री कुंदन कुमार,वरीय प्रशाखा अभियंता,रेल पथ 11.01.2010 से मतलब 14 साल से मुख्यालय का हवा खा रहे हैं। और इन सबसे आगे श्री दिलीप कुमार सिंह जो 01.01.2009 से मतलब लगभग 15 सालों से कार्यालय अधीक्षक का दायित्व निभा रहे हैं।

महानिदेशक लेखा परीक्षा विभाग द्वारा सवाल उठाने पर कार्मिक विभाग ने भी अपनी रूटीन कार्यवाही कर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली है लेकिन अभियंत्रण विभाग ने लम्बी अवधि से एक ही पदस्थापित तीनों कर्मियों का स्थानांतरण नहीं करके अपनी बेबसी का दर्शन कराया हैं। बेबसी का कारण क्या क्या हों सकता हैं, विश्लेषण का विषय है जिसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी।

ऐसा भी नहीं हैं कि ऐसा सिर्फ अभियंत्रण विभाग के मुख्यालय में ही हैं, पूर्व मध्य रेलवे के पांचों मंडल में लम्बे अवधि से पदस्थापित कर्मियों की लिस्ट लम्बी है जो अपने आप को शक्तिमान समझ बैठे हैं। ऐसे शक्तिमान कर्मियों में प्रथम स्थान रखतें हैं दानापुर मंडल मुख्यालय में पदस्थापित श्री मुकेश कुमार जो लगभग 28 सालों से वरीय प्रशाखा अभियंता,(प्लानिंग) के दायित्व निभा रहे हैं, और यह कोई मज़ाक नहीं हकीकत है जहां प्रत्येक चार साल पर स्थानांतरण होना है 28 साल तक एक ही जगह पदस्थापना सिस्टम के साथ मजाक नहीं तो और क्या है!

भले ही पूर्व मध्य रेलवे के अभियंत्रण विभाग का यह रोग पुराना है लेकिन ऐसा भी नहीं हैं कि इस रोग का इलाज संभव नहीं है। पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता हैं कि इलाज़ करें कौन! क्योंकि अभियंत्रण विभाग की व्यवस्था से जातीय संडाध की बदबू आती हैं जिसने सिस्टम को बेपटरी तो किया ही है रेलवे को दीमक की तरह खोखला भी किया है जो कि चिंता का विषय है। लेकिन प्रमुख मुख्य अभियंता (अभियंत्रण) के लिए कुछ करने का समय है, भले ही इन विसंगतियों के लिए इन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इनके कार्यभार संभाले लगभग दो महीने ही हुए हैं लेकिन अपने शेष कार्य काल में लम्बी अवधि से एक ही जगह पदस्थापित वरीय प्रशाखा अभियंता,रेल पथ एवं वरीय प्रशाखा अभियंता (कार्य) का स्थानांतरण करवाना सुनिश्चित कर अपने नियंत्रण का सबूत देंगे इसका उम्मीद तो किया ही जा सकता हैं ।

उम्मीदें हैं तो जिंदगी हैं.. सफ़र जारी हैं।

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