पटना: दिनांक 10 जनवरी 26 के मेरे पिछले आलेख “साहब रिटायर हो गये थे” की अगली कड़ी में यह नया लेख रिटायर हो रहे साहब के ऊपर है।
हमारी परम्परा रही है कि हम से विदा होने वाले को पूरे सम्मान के साथ-साथ कीमती सामान देकर विदा करते हैं।
पर विदाई जब बड़े लोगों की होती है तब विदाई समारोह और भी बड़ा हो जाता है और विदा होने वाले की अपेक्षा भी बड़ी हो जाती है।
और विदाई जब महाप्रबंधक की हो तो समझिये कि व्यवस्था साधारण नहीं विशेष हो जाती है और व्यवस्था के लिए अर्थ की आवश्यकता भी अधिक होती है, फिर इसके लिए अवैध उगाही के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं होता क्यूंकी इसके लिए कोई वैधानिक प्रावधान तो होता नहीं है।
महाप्रबंधक के अधीन 10 विभाग और पांच मंडल और उत्पादन इकाई हैं, सभी का सैकड़ों करोड़ रुपये का बजट है और इस बजट का छोटा अंश इस विदाई समारोह पर खर्च हो भी जाएगा तो कौन सा आसमान टूट कर गिर जाएगा।
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आसमान तब गिरेगा जब व्यवस्था में खोट होगी और यदि विशिष्ट जन का विदाई भव्य नहीं हुआ तो सालाना APAR के चातुर्मास अंश का आकलन अति उत्तम के जगह सामान्य या औसत भी हो सकता है।
बिना अपना हींग फिटकरी लगाये यदि APAR का रंग चोखा हो जाए तो इसमें किसी का क्या जाता है।
यह सब यूं नहीं लिखा गया है क्यूंकि पूर्व मध्य रेल की पुरानी परम्परा रही है और इस परंपरा का निर्वाह बड़े ही सत्यनिष्ठा के साथ की जाती रही है।
महाप्रबंधक के अवकाश प्राप्ति की तिथि के पूर्व उनका दौरा प्रारम्भ हो जाता है। हर मंडल और उत्पादन इकाई के मुखिया इस कार्यक्रम हेतु अपने अपने मंडल में उनके आगमन की तिथि ले लेते हैं तथा पुष्प, फल , चंदन, मिष्ठान्न, द्रव्य ( राशि ) तथा स्वर्ण आभूषण तक की व्यवस्था में लग जाते हैं।
क्योंकि स्वर्ण आभूषण अब पुराने ज़माने की पुरानी बात हो गई है , अब हीरों के हार की व्यवस्था होती है क्योंकि *हीरा है सदा के लिए”।
अब, जबकि परंपरा मैंने बता दिया है, देखना यह है कि पाँचों मंडल के मुखिया, उत्पादन और निर्माण इकाई कब इस परंपरा का निर्वहन करते हैं , क्योंकि अब तो विशेष की विदाई में के केवल कुछ ही दिन शेष हैं।
“गये माघ अब उनतीस दिन बाकि”
सच कड़वा होता है लेकिन सत्यम शिवम सुंदरम,यही तो सत्य है।
सफ़र जारी है..





