पटना: जब एक सरकारी कर्मी चाहे वो केंद्र मे हो या राज्य के अधीन उसके ऊपर नियुक्ति के समय से सरकार और उनके द्वारा निर्मित एजेंसियों के सारे कानून पालन करने को बाध्य हो जाते हैं जिनके अंतर्गत रहते हुए उन्हें अपने कार्य को निष्पादित करना पड़ता हैं।
सरकार द्वारा अधिरोपित सारे कानूनो मे सरकारी कर्मी से गलती होने पर सुनवाई का अवसर प्राप्त होता है,किन्तु केंद्र सरकार के एक कानून जिसमे संशोधन के उपरांत अब वही कानून केंद्र एवं राज्य सरकार के कर्मियों के लिए अभेद और असाध्य हथियार के रूप मे उनका काल बन चुकी हैं जी हां बात हो रही हैं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 ।
जिसने अभी तक असंख्य निर्दोष जीवन को निगल जाने वाले काले कानून जो सजा से पहले सुनवाई का मौका ना दे। आपके, बस एक झूठा आरोप, कुछ शब्दों की कलाबाज़िया और आप सलाखों के पीछे, और ज़मानत का प्रावधान भी नहीं।
जिसका ताज़ा उदाहरण पूर्व मध्य रेलवे के दानापुर मंडल में देखने को मिल रहा है।दानापुर मंडल के अभियंत्रण विभाग के कर्मियों को पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से भुगतना पड़ रहा है और वो रेल प्रशासन की अनदेखी के कारण।
कार्य अनुभाग के मंत्रालीय संवर्ग मे कार्यरत एक विधवा महिला रेल कर्मचारी जो अनुसूचित वर्ग से आती हैं, उनकी नियुक्ति अनुकम्पा के आधार पर हुई थी और उनके द्वारा आरोप हैं की उनके साथ कार्यरत एक पुरुष सहकर्मी ओबीसी द्वारा उसे गलत इरादे से धक्का दिया, सत्यता की पुष्टि और साक्ष्य अनुपलब्ध हैं किंतु फिर भी उक्त पुरुष हाथ जोड़ का अन्य कर्मचारियों के समक्ष माफ़ी मांग ली, किंतु उक्त महिला कर्मचारी ने अपने पिता , भाई और अन्य के साथ आकर 10.08.2026 को 12:40 के आस पास कार्यालय अवधी के दौरान उस पुरुष कर्मचारी को सभी के सामने गाली-गलौज, जान से मारने की धमकी देते हैं और इस पुरे घटना का संचालन उक्त महिला कर्मी के इशारे पर होता हैं।
इस घटना के विरोध मे सभी कर्मचारी एकजुट होकर वरीय मंडल अभियंता (समन्वय )/दानापुर को विरोध और लगभग 30 कर्मियों द्वारा संयुक्त रूप से लिखित आवेदन 10.08.2026 को उनके कक्ष मे दिया जाता हैं, जिसके विरोध मे महिला कर्मी ने उस पुरुष कर्मी एवं अन्य पर मानसिक रूप से प्रताड़ित, पानी नहीं पीने देने के साथ-साथ जाति सूचक शब्द द्वारा बार बार अपमानित किए जाने का आरोप लगाते हुए आवेदन 11.08.2026 को मंडल रेल प्रबंधक / दानापुर एवं अन्य अधिकारियो को दिया हैं । उक्त महिला कर्मी आवेदन मे अपने पिता, भाई एवं अन्य द्वारा कृत्य घटना को जान-बूझकर वर्णन नहीं किया हैं ताकि रेल प्रशासन को गुमराह किया जा सके।
सूत्रों से पता चला हैं की कार्यालय मे महिला कर्मी द्वारा आवंटित कार्य नहीं किए जाने और कार्य करने का कोई दबाव ना बनाये, इसलिए ही ऐसा साजिश रचा गया है।
बिना किसी पूर्व सुचना के छुट्टी एवं कार्यालय से चले जाना आदत मे सुमार रहा हैं। महिला कर्मी पूर्व मे भी कई बार धमकी देती आयी हैं और कर्मियों को चुप रहने के अलावा कोई चारा नहीं हैं ।
किंतु इस बार इस अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 द्वारा प्रदत्त कवच को हथियार मे बदलकर सभी कर्मियों और उनके परिवारजनों की जीवन मे भूचाल लाना चाहती हैं।
रेल प्रशासन ने अभी तक कोई ठोस कदम उस महिला कर्मी के विरुद्ध नहीं उठाया हैं, जिससे अभियंत्रण विभाग मे कार्यरत कर्मचारियों मे रोष का माहौल हैं।
बात सोचने वाली और चिंतनीय है, क्या इस तरह के माहौल में जहां एक ऐसी महिला जिसकी नियुक्ति अनुकंपा पर हुई है और प्रदत अधिकारों का दुरूपयोग कर अपने कर्तव्यों का पालन करने के बजाय अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले कर्मचारियों को मानसिक तनाव और प्रताड़ित करने का प्रयास करें तो क्या विभागीय अधिकारियों को संभव प्रयास नहीं करना चाहिए!





