पटना: भारतीय रेलवे में कायदे-कानून और नियम-पुस्तिकाएं (Rule Books) सिर्फ चौथे और तीसरे वर्ग के आम कर्मचारियों की रीढ़ तोड़ने, उन्हें चार्जशीट थमाने या नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए छापी जाती हैं। साहब बहादुरों के लिए ये नियम किसी रद्दी कागज से ज्यादा अहमियत नहीं रखते। जब प्रशासनिक रसूख और आकाओं की ‘कृपा’ सर चढ़कर बोलती है, तो ट्रांसफर पॉलिसी रेलवे ट्रैक पर दौड़ने वाली मालगाड़ी के नीचे आकर दम तोड़ देती है। आज का यह तीखा विश्लेषण रेलवे के इसी सड़ चुके तंत्र के दो बड़े चेहरों की ‘अटूट यारी’ और भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमानों की कलई खोलता है।
‘आरा जिला घर बा… त कउन बात के डर बा!’ का प्रशासनिक नशा
इस प्रशासनिक ड्रामे के मुख्य किरदार हैं जैश कुमार। कागजों पर तो ये यूपीएससी (UPSC) 2018 बैच के आईआरपीएस (IRPS) अधिकारी हैं, लेकिन इनकी कार्यशैली देखकर लगता है कि इन्होंने संविधान की शपथ नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि आरा (बिहार) के उस अहंकार की शपथ ली है, जो कहता है—“आरा जिला घर बा, त कउन बात के डर बा!” जैश साहब ने रेलवे को अपनी पुश्तैनी जागीर समझ लिया और कानून को ठेंगे पर रख दिया।
जुलाई 2025 की बात है, जब ये साहब डीडीयू (DDU) मंडल में डीपीओ (DPO) के पद पर मलाई काट रहे थे। तब इन पर एक सीधे-साधे रेल कर्मचारी की पत्नी के साथ घोर बदसलूकी और बदतमीजी करने का शर्मनाक आरोप लगा। मामला इतना संगीन था कि चंदौली न्यायालय को दखल देना पड़ा और इनके खिलाफ बकायदा क्रिमिनल केस दर्ज हुआ, जो आज भी अदालत के चक्कर काट रहा है।
सुरजीत कुमार की ‘रेड’ और जैश का डबल रोल!
इस कहानी में भ्रष्टाचार की परतें तब और गहरी हो गईं जब इनके करीबी और तथाकथित भ्रष्टाचारी सुरजीत सिंह के काले कारनामों का भंडाफोड़ हुआ। सुरजीत सिंह जब बड़ी रेड में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत रंगे हाथों दबोचे गए, तो कायदे से पूरे नेटवर्क की जांच होनी चाहिए थी। लेकिन यहां तो खेल ही उलटा चल रहा था!
सुरजीत सिंह के शिकंजे में कसने के बाद, उनके पद का अतिरिक्त प्रभार (Additional Charge) किसी और को नहीं, बल्कि हमारे इसी नायक जैश कुमार को सौंप दिया गया। यानी एक भ्रष्टाचारी सहयोगी के महकमे पर भी एकाधिकार! पीड़ित कर्मचारी को प्रताड़ित करने और साक्ष्यों को दबाने के लिए इससे मुफीद माहौल भला और क्या हो सकता था? जब डीडीयू मंडल में इस जुगलबंदी की वजह से रेलवे की इज्जत सरेआम नीलाम होने लगी, तब जाकर इस प्रशासनिक ड्रामे का दूसरा अंक शुरू हुआ।
रेलवे का अनूठा न्याय: बदनामी पर सरेआम ‘प्रमोशन’ का पुरस्कार
सभ्य समाजों और नियमबद्ध विभागों में उम्मीद की जाती है कि जिस अधिकारी पर अदालत में आपराधिक मुकदमा चल रहा हो, उसे सस्पेंड कर जांच बैठाई जाए। लेकिन पूर्व मध्य रेलवे (ECR) की लीला ही अपरंपार है! जब डीडीयू मंडल में जैश साहब के कारनामों की थू-थू होने लगी, तो इन्हें सजा देने के बजाय ‘प्रमोशन’ का शाही तोहफा दिया गया।
परम मित्र अमरेंद्र कुमार के वरदहस्त से ऑफिस ऑर्डर संख्या GAZ/287/2025 (दिनांक: 19/12/2025) जारी कराया गया और दागदार जैश साहब को हाजीपुर मुख्यालय बुलाकर डिप्टी सीपीओ (Dy. CPO/HQ/HJP) के मखमली पद पर बैठा दिया गया। मगर जिसे ‘डीडीयू’ के चारागाह में बिना रोक-टोक चरने की आदत लग चुकी हो, उसे हाजीपुर की सूखी फाइलें कहां हजम होने वाली थीं! साहब की नजरें फिर से उसी मलाईदार पोस्टिंग पर टिक गईं, जहां जवाबदेही शून्य और ‘कमाई’ अनंत हो।
अमरेंद्र कुमार (AGM/HJP) की यारी: नियम ताक पर, भ्रष्टाचार शीर्ष पर
अब शुरू हुआ सिस्टम को सरेआम ठगने का असली खेल, जिसके सूत्रधार बने हाजीपुर के एजीएम (AGM) अमरेंद्र कुमार। अमरेंद्र जी ने अपनी दोस्ती का कर्ज चुकाने के लिए रेलवे के सारे ट्रांसफर नियमों की धज्जियां उड़ा दीं। जनता और विजिलेंस की आंखों में धूल झोंकने के लिए पहले एक बिचौलिया रास्ता तैयार किया गया। ऑफिस आदेश संख्या GAZ/087/2026 (दिनांक: 13/04/2026) के तहत जैश कुमार को हाजीपुर में संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) के रूप में री-इंगेज किया गया।
यह सिर्फ एक मोहरा था, असली चाल तो इसके तुरंत बाद चली गई। रेलवे के सबसे बदनाम हथियार ‘ऑन रिक्वेस्ट’ (On Request) ट्रांसफर का सहारा लिया गया। रातों-रात एक और गुप्त ऑफिस ऑर्डर (GAZ/151/2026) जारी हुआ और जैश कुमार को चुपचाप वापस डीडीयू मंडल में डिप्टी सीपीओ/प्लांट डिपो (Dy. CPO/Plant Depot/DDU) के पद पर दोबारा पुनर्स्थापित कर दिया गया। इसे कहते हैं अंधेर नगरी चौपट राजा! सिर्फ कुर्सी का नाम बदला, साम्राज्य वही रहा। “चोर-चोर मौसेरे भाई” की यह कहावत पूर्व मध्य रेलवे के इस गठजोड़ पर सौ फीसदी सटीक बैठती है।
डीडीयू मंडल: रसूखदारों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी?
यहां एक यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि पूरे भारतीय रेलवे के तमाम जोनों को छोड़कर, इस ईसीआर (ECR) और विशेषकर डीडीयू (DDU) मंडल में ऐसा कौन सा गुप्त खजाना गड़ा है कि जो साहब एक बार यहां पैर जमा लेते हैं, वे वापस जाने का नाम ही नहीं लेते?
यहां ट्रांसफर-पोस्टिंग महज़ एक कागजी खानापूर्ति है। अधिकारी का केवल केबिन बदलता है, लेकिन उसका सिंडिकेट, उसका प्रभाव और उसका मलाई तंत्र वैसा ही बना रहता है। यह प्रशासनिक शतरंज़ का वह संस्थागत भ्रष्टाचार है, जिसे देखकर बड़े से बड़ा घोटालेबाज भी शरमा जाए।
रेल मंत्रालय और रेल मंत्री की चुप्पी पर तीखे सवाल
• जब देश का हर आईआरपीएस अधिकारी एक ही यूपीएससी (UPSC) परीक्षा से तपकर निकलता है, तो जैश कुमार जैसे चंद लाडलों पर ऑल इंडिया ट्रांसफर पॉलिसी (All India Transfer Policy) लागू क्यों नहीं होती?
• क्यों कुछ चुनिंदा अधिकारियों को उनके गृह जनपद के बगल में सालों-साल कुंडली मारकर बैठने की खुली छूट दी जाती है? क्या रेल मंत्रालय ने इन्हें गोद ले रखा है?
• यह ‘ऑन रिक्वेस्ट’ ट्रांसफर पॉलिसी है या भ्रष्टाचार को वैधानिक रूप देने का कोई संगठित गोरखधंधा?
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रेल मंत्रालय और माननीय रेल मंत्री जी को अपनी गहरी नींद से जागना होगा और इस मलाईदार नेक्सस का पूरी तरह से पोस्टमार्टम करना होगा। अगर इस संगठित गिरोह पर नकेल नहीं कसी गई, तो आम और ईमानदार रेल कर्मचारी अपनी जायज अर्जियां लेकर सालों-साल दफ्तरों के बाहर एड़ियां रगड़ते रहेंगे। उनके हिस्से सिर्फ चार्जशीट, प्रताड़ना और सस्पेंशन का कोड़ा आएगा, जबकि जैश कुमार जैसे रसूखदार लोग अपने ‘अमरेंद्र’ जैसों की बैसाखी थामकर रेलवे की छाती पर मूंग दलते रहेंगे। अब वक्त आ गया है कि इस ‘आरा जिला’ वाले गुंडागर्दी के प्रशासनिक मॉडल को उखाड़ फेंका जाए!
सफर जारी है।






