पटना: पूर्व मध्य रेलवे का नाम बदलकर “गुरुत्वाकर्षण रेलवे” कर देना चाहिए क्योंकि इस रेलवे में इतना सम्मोहन है कि कोई भी भ्रष्टाचारी लोभी अधिकारी इसके पाश में फंसने को तैयार रहता है । ऐसे अधिकारियों की संख्या अनगिनत है लेकिन आज बात होगी एक निकम्मे बेईमान और कंबल ओढ़ कर घटा घट घी पीने वाले अधिकारी की । जी हां बात हो रही है भ्रष्टाचार के सागर में गोता लगा रहे मुखौटा धारी मुख्य कार्यकारी अधिकारी निर्माण संगठन उत्तर की । महाशय 2022 में एक लंबे कार्यकाल के बाद ईसीआर से दर बदर किए गए बिलासपुर के लिए,लेकिन बेचैनी और भूख बर्दाश्त करने की क्षमता खत्म होते ही 2025 में अमृत पान करने पूर्व मध्य रेल में वापस आ गए ।
पांच महीने में ही मुख्य प्रशासनिक अधिकारी निर्माण संगठन उत्तर पटना बना दिए गए । अव्वल दर्जे के कामचोर अधिकारी को इस पद पर बिठाने वाले रेलवे बोर्ड के चेयरमैन शायद इस बात से अवगत नहीं होंगे या फिर उन्हें गुमराह किया गया होगा, ये अधिकारी काम कैसे नहीं हो और बिना काम किए संवेदकों को परेशान कर पैसा कमाने की कला में माहिर है । अपने पहले के कार्यकाल में भी उसने काम नहीं करने की कसम खायी थी और आज भी उस क़सम को निभा रहा है और इन सब चक्कर में अगर किसी का नुक़सान हो रहा है तो वह है भारतीय रेल ।
इसने एक ऐसा नेटवर्क फैला रखा है जिसके तहत यह अधिकारी कंबल ओढ़ कर घी पी रहा है । काम नहीं करना या काम नहीं होने देना भी गंभीर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है । कोई भी इनके लगभग चार महीने का कार्यकाल का लेखा जोखा देख सकता है । निहायती बदतमीज और घटिया मानसिकता का अधिकारी अपने वसूली के लिए एक तंत्र फैला रखा है । निर्माण संगठन में दागी अधिकारियों को मुख्य कार्यकारी अधिकारी का सचिव बनाने की पुरानी व्यवस्था है, चोर को चोरी करने के सौ तरीके मालूम होता है और इसका फायदा सीधे मुखिया शेर को होता है, सियार बचे खुचे मांस से अपना काम चला लेता है ।
इन महाशय के महान सचिव का स्थानांतरण ओपन लाइन में दानापुर मंडल में कर दिया गया है और काफ़ी समय हो गया है फिर भी ना मुख्य प्रशासनिक अधिकारी उनको छोड़ रहे ना सचिव महोदय उनको । दोनों की केमिस्ट्री बाक़ी लोगों का तेल निकाल रहा है । एक अधिकारी जिसका दूसरे रेलवे में स्थानांतरण हो चुका है वो मंडल का मज़ा ले रहा है और सचिव साहब यहां मजे ले रहे हैं और दोनों के मजे में भारतीय रेल पीस रही है । क्या कारण है कि मुख्य प्रशासनिक अधिकारी निर्माण संगठन उत्तर के सचिव को मंडल के लिए विरमित नहीं किया गया है ।
क्या वे रंजन के मनोरंजन का आनंद ले रहे हैं । रंजन सचिव साहब के स्वजातीय हैं इसलिए सेवा निवृत्ति के बाद भी उनका महेंद्रू दरबार लग रहा है और संवेदकों का शोषण जारी है । दोनों सचिवों के स्वजातीय होने का रंजन ने खूब भंजाया । गोपनीय सरकारी कागजों तक निर्बाध पहुंच रंजन को तांडव करने की ऊर्जा देता है । रिटायरमेंट के बाद रंजन बाबू या बाबू रंजन किस हैसियत से सरकारी कागजों पर कब्ज़ा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे । इसमें उनके स्वजातीय सचिवों की क्या भूमिका है ? सीधी भर्ती के नए JAG और SG अधिकारियों को सचिव क्यों बनाया जाता है ? एक ओर फील्ड में अधिकारियों की कमी है और दूसरी ओर क्लेरिकल काम जैसे कि CAO के गाड़ी होटल रेस्ट हाउस उनकी पत्नियों की सेवा के लिए सीधी भर्ती वाले सीनियर IRSE अधिकारी रखे जाते हैं ।
यही सचिव CAO के लिए वसूली का भी कार्य करते हैं । इनका मुख्य काम वसूली होता है । जो सचिव एग्रीड या सीक्रेट लिस्ट में नहीं होते वो बैठकर टेंडर करते हैं और लूट का तंत्र चलाते हैं । मजबूत और दबंग ठीकेदारों के तलवे चाटने और टुकड़ों पर पलने वाले ये प्रशासनिक अधिकारी कमजोर और नियम से काम करने वाले संवेदकों के लिए काल होते हैं । सुनने में आया है कि इनके साजिश के आगे सीबीआई भी थक हार कर बैठ गई है और निर्माण संगठन को अपने नियति पर छोड़ दिया है । ये पूरे रेल प्रशासन के लिए चिंता का विषय है । काम नहीं करना , काम नहीं होने देने और विधवा विलाप में पारंगत इस मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को तुरंत हटाना चाहिए और सीधी भर्ती वाले IRSE अधिकारियों को सचिव बनाने के प्रैक्टिस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए ।
क्या यह संभव नहीं है? संभव है बशर्ते भारतीय रेल के टेक्नोक्रेट एवं ब्यूरोक्रेट रेलमंत्री श्रीमान अश्विनी वैश्णव रील की दुनिया से बाहर निकले और रेल की दशा दिशा और दुर्दशा को दुरुस्त करने का प्रयास करें।
सफ़र जारी है…





