ECR जोन बना हत्यारों का जोन !अधिकारियों की मनमानी कर्मचारियों को पड़ रही जान गवानी!

ECR जोन बना हत्यारों का जोन !अधिकारियों की मनमानी कर्मचारियों को पड़ रही जान गवानी!

पटना: आज मैं आपके सामने एक ऐसा मामला रखने जा रहा हूं, जो आपकी आत्मा और अंतरात्मा दोनों को झकझोर देगा। मामला पूर्व मध्य रेल (ECR) के धनबाद डिवीजन का है, जहां Sr.DEE ( OP) धनबाद रजत कुमार सिंह जैसे अधिकारी का संस्कृति और मानसिक प्रताड़ना का एक ऐसा खौफनाक चेहरा सामने आया है जिसने मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर दिया है। मामला सीएलआई (CLI) स्व. श्री बी. चैंपिया जी का है, जो व्यवस्था की बलि चढ़ गए। और यह हाल केवल धनबाद मंडल का नहीं है।

चाहे वह ECR का DHN ,DDU, DNR अथवा अन्य कोई भी मंडल हो सभी जगह कर्मचारियों का शोषण जारी है और जब शिकायत होती है तो रजत कुमार सिंह जैसे ECR में सैकड़ो अधिकारी है जो अपने पद और पावर का रसूख दिखाकर रेलवे बोर्ड तक मामले को रफा दफा करने की हिमाकत कर सकते है । और करें भी क्यों न ? जब किसी अधिकारी पर आंच आती है तो रेलवे बोर्ड तक पूरा अधिकारी लॉबी एक हो जाता है परंतु जब किसी कर्मचारी पर आंच आए तो कर्मचारी एकता केवल सोशल मीडिया तक ही सिमित रह जाती है ।

यह पहली बार नही है कि Sr.DEE ( OP) धनबाद रजत कुमार सिंह द्वारा कर्मचारी के शोषण की पहली घटना है, NCR मे भी इन्होंने कर्मचारियों के शोषण में कोई कसर नहीं छोड़ी और जब कर्मचारियों के तरफ से कड़ा विरोध किया गया तो दंडात्मक क्रिया के नाम पर केवल इनका स्थानांतरण करते हुए धनबाद मंडल में स्थानांतरण कर दिया गया और यह पहली दफा ऐसा नहीं हुआ है आखिरकार साहब हमारे माननीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह से सीधा संबंध रखने का दावा करते हैं ।

जब कुर्सियां जल्लाद बन जाएं और दफ्तर कुरुक्षेत्र : कहते हैं ना कि नौकरी इंसान अपनी और अपने परिवार की जिंदगी संवारने के लिए करता है, लेकिन धनबाद डिवीजन के इस मामले ने साबित कर दिया है कि यहां नौकरी का मतलब अपनी जिंदगी को किश्तों में नीलाम करना है। जब एक अधिकारी इस हद तक किसी मातहत को जलील और मजबूर करने लगे कि सामने वाले के भीतर से जीवन जीने की इच्छा ही खत्म हो जाए, तो समझ जाना चाहिए कि व्यवस्था के फेफड़ों में सड़न पैदा हो चुकी है। सोचिए, उस इंसान पर क्या गुजरी होगी? मौत को गले लगाने से ठीक पहले वह किस मानसिक दर्द, छटपटाहट और प्रताड़ना के कुरुक्षेत्र से गुजरा होगा?

एक ऐसा दौर, जब दुनिया में सबसे अजीज और प्यारे—अपनी पत्नी और बच्चों का चेहरा भी उसकी आँखों के सामने धुंधला गया होगा। जब एक पिता और पति के दिल से अपने ही बच्चों का ख्याल मिट जाए, तो अंदाज़ा लगाइए कि अधिकारी की प्रताड़ना का ज़हर कितना गहरा रहा होगा। आत्महत्या केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं है, यह तंत्र द्वारा की गई एक सोची-समझी हत्या है। इसलिए यह शीर्षक पूरी तरह सटीक बैठता है—’ईसीआर’ जोन अब हत्यारों का जोन बनता जा रहा है।

‘साहब की ‘फाइल’ और कर्मचारी की ‘लाश’: हमारे रेल प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां काम के आंकड़े चमकाने के लिए इंसानों को गाजर-मूली समझ लिया जाता है। टारगेट पूरा करने और अपनी कुर्सी की धौंस जमाने के लिए अधिकारियों की ‘मानसिक तानाशाही’ इस कदर हावी है कि उन्हें सामने बैठा कर्मचारी हाड़-मांस का इंसान नहीं, बल्कि एक बंधुआ मज़दूर दिखाई देता है। स्व० श्री बी. चैंपिया जी के साथ जो हुआ, वह कोई पहला या आखिरी मामला नहीं है। यह उस क्रूर व्यवस्था का प्रतीक है जहां कर्मचारियों को ‘टूल’ समझा जाता है। अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फरमान जारी करते हैं और ग्राउंड पर काम करने वाला कर्मचारी तनाव के उस पीड़ा और दवाब में जीता है जो किसी भी दिन फट सकता है। साहबों के अहंकार की भूख इतनी बड़ी हो चुकी है कि अब उसे शांत करने के लिए कर्मचारियों की जान की आहुति चाहिए।

आईना देखना जरूरी है… यह घटना कर्मचारियों के लिए एक चेतावनी है। कर्मचारी चौबीसों घंटे रेलवे के पहियों को रफ्तार देने में लगे हैं, यह सोचकर कि हमारा भविष्य सुरक्षित है। लेकिन हकीकत यह है कि कर्मचारी एक ऐसे दलदल में हैं जहां आपके काम की कद्र तब तक ही है जब तक आप जी हुज़ूरी कर रहे हैं। जिस दिन आपने अपनी गरिमा की बात की या जिस दिन आप साहब के अहंकार के आड़े आए, आपको मानसिक रूप से इस कदर खोखला कर दिया जाएगा कि मौत ही एकमात्र रास्ता नज़र आने लगेगी।

धनबाद मंडल का यह प्रशासन इस बात का जवाब दे कि स्व० श्री बी. चैंपिया जी के परिवार को जो कभी न भरने वाला जख्म मिला है, उसकी भरपाई कौन सी फाइल करेगी? क्या उन साहब की ऊंची साख और पद इस आत्मघाती दर्द का हिसाब दे पाएंगे?अब समय आ गया है कि इस ‘साहब संस्कृति’ और प्रताड़ना के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए, वरना आज स्व॰ श्री बी. चैंपिया जी इस व्यवस्था की भेंट चढ़े हैं, कल किसी और की बारी होगी। रेलवे को अपनी पटरियों को दुरुस्त करने से पहले, अपने अधिकारियों की मानसिकता को दुरुस्त करना होगा, नहीं तो विकास के ऊंचे दावों के नीचे ऐसे ही कई और बेगुनाह मुलाज़िम दम तोड़ते रहेंगे। और उनकी आत्मा हमें देखकर कुठित और दुःखी होती रहेगी।
Railwellwishers परिवार की ओर से स्व बी. चैंपिया जी को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि

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