पटना: यह तो सभी जानते हैं कि भारतीय रेल में ख़ान पान सेवा की जिम्मेदारी आईआरसीटीसी की है लेकिन क्या यह संभव है कि इतने बड़े सेवा को कोई अकेले देखें,इसी सोच के साथ रेलवे सुरक्षा बल और जीआरपी इस पुनीत कार्य में पुरे मनोयोग से सहयोग करती है। वैसे भी 1957 में एक फिल्म आई थी “नया दौर”, और इस फिल्म का एक गाना बड़ा ही चर्चित हुआ था “एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना,साथी हाथ बढ़ाना”। आज़ के दौर में आईआरसीटीसी के ख़ान पान सेवा के समानांतर आरपीएफ एवं जीआरपी फिल्म “नया दौर”के गाने को साकार कर रही है।
बात 06 जून 2026 की है, पूर्व मध्य रेलवे के महाभ्रष्ट एवं मति भ्रष्ट महाप्रबंधक छत्रसाल सिंह जो “धृतराष्ट्र”की भूमिका में चर्चित है, गया – कोडरमा – हजारीबाग टाउन – अरगडा – पतरातू – गढ़वा रोड़ का विंडो ट्रेलिंग निरीक्षण कर लौट रहे थे,या यूं कहिए कि उस खंड से “भीक्षाटन” कर लौट रहे थे,भीक्षाटन इसलिए क्योंकि निरीक्षण हो और भीक्षाटन न हो ऐसा हो ही नहीं सकता क्योंकि निरीक्षण में भीक्षाटन अब एक सिस्टम बन चुका है!
निरीक्षण एवं भीक्षाटन उपरांत महामहिम महाप्रबंधक महोदय की नजर पटना जंक्शन पर आरपीएफ द्वारा संचालित ख़ान पान सेवा पर पड़ गई तो उन्होंने दानापुर के मंडल रेल प्रबंधक महोदय से आरपीएफ विभाग द्वारा किए जा पुनीत कार्य की सराहना कर दी और मंडल रेल प्रबंधक महोदय ने आरपीएफ कमांडेंट से विभाग द्वारा किए जा रहे पुनीत कार्य की सराहना कर दी और जब सराहना मिली तो पुरस्कार भी मिलना तय था तो आनन फानन में आरपीएफ पोस्ट के प्रभारी मृणाल को निलंबित कर दिया गया।
विश्वनीय सूत्रों के अनुसार 06.06.2026 को पटना रेलवे स्टेशन क्षेत्र में अवैध वेंडिंग एवं अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई के दौरान कई अनियमितताएं सामने आई।यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि ऐसी गतिविधियां लंबे समय से संचालित थी, तो इसकी जिम्मेदारी केवल पटना पोस्ट के निरीक्षक तक सीमित नहीं हो सकती। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिनांक 06.06.2026 को वरीय मंडल सुरक्षा आयुक्त, दानापुर द्वारा स्वयं के नेतृत्व में पटना स्टेशन पर विशेष अभियान चलाकर 26 अवैध व्यापार करने वाले व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या व्यापक थी और इसकी जवाबदेही का निर्धारण अपराध आसुचना शाखा दानापुर के निरीक्षक राजकुमार के भूमिका और संरक्षण का सीसीटीवी की सहयोग से विभिन्न स्तरों पर निष्पक्ष जांच के माध्यम से दायित्व निर्धारण करते हुए कार्रवाई किया जाना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि साफ सुथरी छवि के युवा प्रमुख मुख्य सुरक्षा आयुक्त क्या अपनी छवि के साथ न्याय करेंगे क्योंकि निर्दोष को सजा और दोषी को मजा किस सिद्धांत का दर्शन करा रहा है, सोचनीय और विचारणीय है ! खैर प्रमुख मुख्य सुरक्षा आयुक्त के लिए वक्त आत्मचिंतन का है क्योंकि भले ही दोषी बच जाए लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए, भारतीय दर्शन तो यही कहता है।
उम्मीद है तो जिंदगी है!
सफ़र जारी है…





