पटना: वर्ष 1980 में एक कामेडी फिल्म आई थी ” हम नहीं सुधरेंगे” और संयोगवश भारतीय रेल में आईआरपीएस कैडर की शुरुआत भी 1980 में ही हुई थी , और जिसका मूल उद्देश्य था कर्मियों के दशा एवं दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाना। लेकिन दुर्भाग्यवश आईआरपीएस कैडर के कारनामों से ना अधिकारी खुश हैं और ना ही कर्मचारी!
कड़वा सच यह है कि आईआरपीएस कैडर सबसे छटुआ कैडर है या कह सकते हैं कि यह कुंठित लोगों का कैडर है और शायद यही कारण है कि कमिर्यों को नैसर्गिक न्याय से वंचित करते हैं।

ऐसी ही एक कहानी है RRC/RRB पटना से चयनित उन कर्मचारियों की, जिन्होंने लगभग छः सात वर्षों तक पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपनी सेवाएं दी।हर कर्मचारी की तरह उनका भी सपना था कि यदि उनके पास आवश्यक योग्यता, डिग्री और क्षमता है, तो उन्हें उच्च पद पर आगे बढ़ने का अवसर मिले।
वर्ष 2023 में RRC द्वारा जुनियर इंजीनियर (JE) पद के लिए विभागीय भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया। विभिन्न विभागों से कार्यरत अनेक कर्मचारियों – जिनमें कुछ लोको पायलट थे, कुछ अन्य पदों पर कार्यरत थे- ने इस परीक्षा में भाग लिया।चयन प्रक्रिया लंबी चली और आखिरकार वर्ष 2026 में प्लांट डिपो डीडीयू में JE (TMC) पद पर नियुक्तियां शुरू हुई।
हालांकि चयन के बाद भी कर्मियों का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। कुछ कर्मचारियों को 7-8 जनवरी 2026 को अपने मूल कार्यस्थल से विरमित कर दिया गया था, लेकिन प्लांट डिपो स्तर पर प्रशासनिक विलम्ब और उदासीनता के कारण उनकी ज्वायनिंग 21,22 और 23 जनवरी तक टलती रही।इन नौ (09) नव नियुक्त ट्रेनी जुनियर इंजीनियरों को अपनी ज्वायनिंग के लिए कई दिनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े। नियुक्ति पत्र हाथ में होने के बाबजूद उन्हें अनावश्यक इंतजार और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा ।
यह केवल नौ (09) कर्मचारियों की कहानी नहीं, बल्कि उन सभी कर्मियों की कहानी है जो अपनी मेहनत, योग्यता और ईमानदारी के बल पर आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन प्रशासनिक देरी और अव्यवस्थाओं के कारण अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करते हैं।
ऐसी ही कहानी RRC/ RRB पटना से चयनित उन कर्मचारियों की है, जिनका चयन GDCE (Departmental Quota) के माध्यम से हुआ था। चयन के समय सबसे बड़ी प्रशासनिक उलझन यह सामने आई कि अभ्यर्थियों से दो विकल्प मांगे गए – या तो पुराना बेसिक पे स्केल स्वीकार करें या नया बेसिक पे स्केल चुनें।नए विकल्प के तहत लेवल 06 में ₹ 35400 का स्टाइपेंड निर्धारित था।
काफी विचार विमर्श और प्रकिया के बाद विभाग द्वारा नियुक्ति पत्र जारी किया गया, जिसमें स्पष्ट रूप से लेवल- 06 के साथ ₹35400+ डीए+ सामान्य भत्तों (Usual Allowances) का उल्लेख किया गया। इस पत्र को प्राप्त कर सभी चयनित अभ्यर्थी अत्यन्त उत्साहित हुए और इसे अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हुए खुशी खुशी फील्ड ट्रेनिंग के लिए रवाना हो गए। लगभग चार से पांच महीने तक उन्होंने ईमानदारी से प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
नियुक्ति प्रक्रिया RBE 48/06 नियमावली के अंर्तगत की गई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से दो विकल्पों का उल्लेख था। पहला विकल्प पुराने वेतनमान के अनुसार सभी भत्तों – TA,HRA,TPA आदि के साथ वेतन प्राप्त करने का था। जबकि दूसरे विकल्प में नए वेतनमान के अनुसार बेसिक ₹35400,DA,HRA तथा अन्य लागू भत्तों का प्रावधान था। साथ ही यह भी नियम था कि विशेष आदेश होने तक TA भी देय रहेगा।
इसी बीच जब ये नव नियुक्त ट्रेनी जुनियर इंजीनियर अप्रैल माह में ज़ोनल स्तर की ट्रेनिंग (ZRTI Training) के लिए गए तो वहां से उन्हें TA से संबंधित एक आधिकारिक आदेश पत्र प्राप्त हुआ उस आदेश के आधार पर उन्होंने TA का दावा तैयार किया और आवश्यक प्रकिया पूरी कर प्लांट डिपो डीडीयू में जमा भी किया।
लेकिन दुर्भाग्यवश प्लांट डिपो स्तर पर इस आदेश को स्वीकार नहीं किया गया और इसे मानने से इंकार कर दिया गया। इससे चयनित कर्मचारियों के सामने एक नई प्रशासनिक उलझन और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई, जबकि वे पहले ही चयन, ज्वायनिंग, प्रशिक्षण की लंबी प्रक्रिया से गुजर चुके थे।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि प्लांट डिपो के कार्मिक एवं स्थापना विभाग को LDCE और GDCE के नियमों तथा उनके बीच के अंतर की सही जानकारी नहीं है। यही कारण है कि प्रशिक्षण अवधि में देय भत्तों के मामले में बार बार भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से ₹35400,+ महंगाई भत्ता (DA)+ अन्य अनुमन्य भत्ते (Admissible Allowances) का उल्लेख है। इसके बाबजूद केवल बेसिक पे और डीए का भुगतान किया जा रहा है तथा अन्य देय भत्तों जैसे HRA और TA पर विचार ही नहीं किया जा रहा है।
कई बार रेलवे बोर्ड के आदेश, संबंधित नियम तथा अन्य इकाइयों के उदाहरण प्रस्तुत किए गए। 2023 की RRC भर्ती के अन्तर्गत नियुक्त अन्य कर्मचारियों को विभिन्न इकाइयों और मंडलों में रेलवे बोर्ड के निर्देशों के अनुसार HRA एवं TA का लाभ दिया गया। समस्तीपुर एवं धनबाद मंडलों के वेतन विवरण भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए, फिर भी प्लांट डिपो के कार्मिक विभाग के स्थापना शाखा का जबाब यही रहता है कि “वे देते हैं तो दें,हम नहीं देंगे”!
यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।जब रेलवे बोर्ड के निर्देश और अन्य इकाइयों में उनका पालन हो रहा है, तो प्लांट डिपो द्वारा उन्हें स्वीकार न करना समझ से परे है। प्लांट डिपो के कार्मिक के इस मनमानी रवैया के कारण प्रशिक्षणरत जुनियर इंजीनियरों को लंबे समय से आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और उन्हें उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।
यह समस्या केवल प्लांट डिपो तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य मंडलों और जोनों में भी सामने आई थी।अंतर केवल इतना है कि कई स्थानों पर कार्मिक विभाग के स्थापना शाखा ने रेलवे बोर्ड के नियमों को सही ढंग से समझा और समय पर स्पष्ट आदेश जारी किए। दक्षिण रेलवे सहित कई इकाइयों ने लिखित रूप से स्पष्ट किया कि स्टाइपेंड प्राप्त करने वाले ट्रेनी JE भी नियमानुसार HRA के पात्र हैं,यही आदेश और दस्तावेज प्लांट डिपो में भी प्रस्तुत किए गए, लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं किया गया।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि अब सात महीने बाद कर्मचारियों से विकल्प ( Option) मांगा जा रहा है तो पिछले सात महीने से केवल बेसिक पे और डीए के आधार पर स्टाइपेंड का भुगतान किस आदेश के तहत किया जा रहा था?
यदि विकल्प लिया ही नहीं गया, तो नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) में स्टाइपेंड का स्पष्ट उल्लेख किस आधार पर किया गया?
और यदि कर्मचारियों ने पहले ही अपना विकल्प दे दिया था, जैसा की उनका कहना है, तो फिर उसी विकल्प के आधार पर नियुक्ति पत्र जारी होने के बाद दोबारा विकल्प मांगने का औचित्य क्या है?
जब GDCE ट्रेनी JE कर्मचारियों ने,सभी नियम, रेलवे बोर्ड के पत्र और अन्य मंडलों के उदाहरणों सहित अपनी बात रखी तथा संबंधित अधिकारियों को स्पीड पोस्ट के माध्यम से अभ्यावेदन भेजा,तब जल्दबाजी में विकल्प लेने संबंधी पत्र जारी किया गया, इससे कई नए प्रश्न खड़े होते हैं, जिनका स्पष्ट उत्तर आज़ तक नहीं दिया गया है।
सबसे विचारणीय बात यह है कि ऐसा प्रतीत होता है कि मानो प्लांट डिपो स्वयं को रेलवे बोर्ड के निर्देशों, पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर के दिशा निर्देशों तथा अन्य जोनों एवं मंडलों में अपनाई जा रही व्यवस्था से अलग मान रहा हो। जबकि भारतीय रेल में सेवा नियम और रेलवे बोर्ड के आदेश पूरे संगठन में समान रूप से लागू होते हैं ।
अतः अपेक्षा है कि प्लांट डिपो का कार्मिक विभाग इस भ्रम से शीघ्र बाहर आए और उपलब्ध सभी तथ्य दस्तावेज, रेलवे बोर्ड के आदेश, अन्य जोनों के उदाहरण तथा कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों पर निष्पक्षता से विचार करें। साथ ही महाप्रबंधक हाजीपुर कार्यालय से आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त कर, नियमानुसार देय HRA,TA, एवं अन्य अनुमन्य भत्तों का भुगतान बिना किसी अनावश्यक विलम्ब के सुनिश्चित किया जाए। इससे न केवल कर्मचारियों के साथ न्याय होगा, बल्कि रेलवे प्रशासन की पारदर्शिता, निष्पक्षता और नियमों के समान अनुपालन की भावना भी मजबूत होगी।
कार्मिक के कुकर्मों की फेहरिस्त लंबी है.. एक और कहानी अगले अंक में..
सफ़र जारी है..





