दीनदयाल उपाध्याय: भारतीय रेल हमेशा यह दावा करती है कि उसकी पहली प्राथमिकता “संरक्षा (Safety) और सुरक्षा (Security)” है। हर दुर्घटना के बाद बड़े-बड़े बयान दिए जाते हैं कि रेल प्रशासन संरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
ऐसा ही एक प्रश्न उस समय खड़ा होता है जब सैयद जफरूल हक, जिन्हें मार्च 2025 में मुख्य क्रू नियंत्रक (Chief Crew Controller), गया के पद से स्थानांतरित कर सीधे Chief Traction Controller, DDU जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया गया। यह पद पूरे मंडल में ट्रैक्शन लोको संचालन और नियंत्रण से जुड़ी गंभीर जिम्मेदारियों वाला पद माना जाता है।
स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलने पर महोदय भी गद्गद रहे होंगे। पहले केवल गया क्षेत्र का दायित्व था, अब पूरे डीडीयू मंडल की ट्रैक्शन लोको कंट्रोलिंग की कमान उनके हाथों में आ गई। रौब भी बढ़ा, अधिकार भी बढ़े और चुन-चुनकर कुछ लोको पायलटों को उनके अधीन काउंसलिंग हेतु नामित कर दिया गया।
लेकिन सवाल यह है कि यदि मात्र 11 लोको पायलटों की काउंसलिंग जैसी सीमित जिम्मेदारी भी प्रभावी ढंग से नहीं निभाई जा रही हो, तो क्या इतने महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी वास्तव में निभाई जा रही होगी?
यदि किसी अधिकारी की कार्यशैली में कमियां हों और उन्हीं कमियों के कारण किसी लोको पायलट से भविष्य में कोई संरक्षा संबंधी त्रुटि हो जाए, तो क्या उसकी नैतिक जिम्मेदारी उस अधिकारी की नहीं होगी जिसने समय पर उचित मार्गदर्शन और काउंसलिंग नहीं की?
दुर्भाग्य से भारतीय रेल में अक्सर देखा गया है कि जब कोई दुर्घटना या संरक्षा संबंधी चूक होती है, तो जांच का पूरा बोझ सबसे पहले लोको पायलट और सहायक लोको पायलट के कंधों पर डाल दिया जाता है। ऊपर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही धीरे-धीरे फाइलों की धूल में दब जाती है। जांच होती है, रिपोर्ट बनती है, लीपापोती होती है और अंत में सबसे आसान लक्ष्य वही कर्मचारी बनता है जो ट्रेन चला रहा था।
यदि संरक्षा वास्तव में सर्वोच्च प्राथमिकता है, तो जवाबदेही भी ऊपर से नीचे तक समान रूप से तय होनी चाहिए। केवल अधिकार देना पर्याप्त नहीं, उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व तय करना भी उतना ही आवश्यक है।
इस घोर लापरवाही की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। नहीं तो इसी तरह संरक्षा और सुरक्षा का मजाक उड़ाया जाता रहेगा।
भारतीय रेल को यह तय करना होगा कि महत्वपूर्ण पद केवल कृपा-दृष्टि से भरने हैं या योग्यता, क्षमता और उत्तरदायित्व के आधार पर। क्योंकि रेल की संरक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि सक्षम और जवाबदेह अधिकारियों से सुनिश्चित होती है।
वरना यह कहना गलत नहीं होगा कि—
“भारतीय रेल में संरक्षा का भाषण ऊपर से चलता है, लेकिन जवाबदेही नीचे वाले कर्मचारी तक आते-आते ही समाप्त हो जाती है।”





