पटना: पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के गलियारों में इन दिनों एक नया ‘विकास कार्य’ जोरों पर है। सोनपुर, समस्तीपुर, धनबाद, डीडीयू (DDU) और दानापुर—इन पांचों डिवीजनों को जोड़ने वाला हाजीपुर का मुख्य किला आज एक अनोखे उत्सव का गवाह बन रहा है। किले के अधिपति, यानी महाप्रबंधक महोदय छत्रसाल सिंह आगामी 31 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। भारतीय रेल के इतिहास में विदाई तो बहुतों की हुई, लेकिन छत्रसाल बाबू की विदाई ने भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची के व्याकरण को ही बदल दिया है।अब तक नियम था कि विदाई मुख्यालय में एक बार होती थी, मगर साहब का रसूख और भूख इतनी बड़ी है कि पांचों डिवीजनों में बारी-बारी से ‘शाही विदाई’ का ताना-बाना बुना गया। हर डिवीजन के आठ-आठ विभागों को इस महा-उत्सव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जब विभाग शामिल होंगे, तो उनके पालतू ठेकेदार कैसे पीछे रहते? यह विदाई समारोह कम और ‘अंतिम चढ़ावा’ वसूली का राष्ट्रीय मेला ज्यादा नजर आ रहा है। ठेकेदार लाइनों में खड़े हैं—हाथों में ‘स्वर्ण मुद्राएं’ (रिश्वत का आधुनिक रूप) और फाइलों का पुलिंदा लिए।मकसद साफ है: जाते-जाते जीएम साहब के दस्तखत से अटके हुए बिल पास हो जाएं और नए टेंडरों का जुगाड़ हो जाए।
अधिकारियों और ठेकेदारों के इस अटूट ‘महागठबंधन’ ने रेलवे को अपनी जागीर समझ लिया है।मंच सज चुका है। दानापुर (पाटलिपुत्र), सोनपुर और धनबाद में यह भव्य और ‘गुपचुप’ तमाशा संपन्न भी हो चुका है। गुपचुप इसलिए, क्योंकि पाप हमेशा अंधेरे और पर्दे के पीछे ही फलता-फूलता है। अब डीडीयू और समस्तीपुर की बारी है, जहां ठेकेदार अपनी थैलियों का मुंह खोलने के लिए तैयार बैठे हैं।इस पूरे तमाशे की सबसे दिलचस्प झांकी है—मंच पर जीएम महोदय के साथ विराजमान उनकी धर्मपत्नी। इन्हें देखकर महाभारत के धृतराष्ट्र और गांधारी की याद ताजा हो जाती है। जब व्यवस्था अंधी हो जाए और कुर्सी पर बैठा हाकिम जनता की गाढ़ी कमाई की लूट पर आंखें मूंद ले, तो वह ‘धृतराष्ट्र’ ही कहलाता है। इस विदाई समारोह में मैडम की गरिमामयी उपस्थिति इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि साहब के इस लंबे और ‘कमाऊ’ कार्यकाल में पर्दे के पीछे से उनकी आंतरिक प्रेरणा और पूर्ण सहयोग हमेशा बना रहा। आखिर सोने की चमक से किसका आंगन नहीं महकता?लेकिन इस जश्न के शोर में कुछ कड़वे सवाल हवा में तैर रहे हैं। आखिर किस रेलवे बोर्ड के नियम ने इन अधिकारियों को जनता के पैसे पर इस तरह ऐश करने और ‘फेयरवेल’ के नाम पर लाखों-करोड़ों उड़ाने का हक दिया है? इस तमाशे से देश, रेल और आम रेल कर्मचारियों को क्या मिला? जवाब है—सिर्फ भारी नुकसान! नुकसान उस आम जनता का, जो टैक्स के रूप में अपनी मेहनत की कमाई इस उम्मीद में देती है कि ट्रेनें समय पर चलेंगी, सुरक्षा बढ़ेगी और सुविधाएं सुधरेंगी। मगर यहां तो जनता के पैसे से साहब का व्यक्तिगत विदाई तिलक हो रहा है।यह सीधे-सीधे देश और जनता के साथ धोखाधड़ी है।
यह निजी स्वार्थ साधने और साधवाने का एक अनूठा, संस्थागत भ्रष्टाचार है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो रेलवे बोर्ड के मौन पर है। क्या दिल्ली में बैठे आका इस महालूट से अनजान हैं या फिर मौन की अपनी एक अलग कीमत होती है?अब देखना यह है कि क्या रेलवे बोर्ड इस पूरे ‘महोत्सव’ पर कोई संज्ञान लेगा? क्या इस भव्य फेयरवेल का कोई विजिलेंस ऑडिट (सतर्कता जांच) कराया जाएगा कि आखिर इस अय्याशी के लिए फंड कहां से आया? अगर सरकारी खजाने से यह पैसा पानी की तरह बहाया गया है, तो उसकी अनुमति देने वाला असली गुनहगार कौन है? रेल मंत्री और देश के मुखिया, जो भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करते हैं, क्या वे इस ‘धृतराष्ट्र ग्रुप’ के कारनामों पर गंभीर कार्रवाई करेंगे, या फिर यह ‘शाही विदाई’ भारतीय रेलवे की फाइलों में एक और अनसुलझा घोटाला बनकर दफन हो जाएगी?




