ECR: अमरेंद्र – कौशलेंद्र की यारी : ECR के TRS/OP DNR के व्यवस्था पर पड़ रहा भारी!

ECR: अमरेंद्र – कौशलेंद्र की यारी : ECR के TRS/OP DNR के व्यवस्था पर पड़ रहा भारी!
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दानापुर: भारतीय रेलवे इन दिनों प्रशासनिक शुचिता, पारदर्शिता और बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ने के नए- नए मानक स्थापित कर रही है, लेकिन पूर्व मध्य रेलवे के दानापुर मंडल के टीआरएस (TRS) परिचालन विभाग ने एक ऐसा “चमत्कार” कर दिखाया है,जिसे देखकर बड़े बड़े जादूगर भी अपनी जादूगरी भूल जाए।

यहां नियम – कानून पटरी से उतरे नहीं है, बल्कि उन्हें बाकायदा डंके की चोट पर भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने वास्ते वीआईपी कोच में बिठाकर कहीं दूर भेज दिया गया है।

इस चमत्कार के मुख्य सूत्रधार है अमरेंद्र कुमार वर्तमान AGM/ECR (पूर्व CELE/ECR) और कौशलेंद्र कुमार,लोको पायलट (पैसेंजर) राजगीर की वह अमर जोड़ी,जिनकी यारी का नया नारा है – “यारी है ईमान मेरा,पर नियत है बेईमान”!

अलाउद्दीन का “चिराग” और दोहरी पदोन्नति का खेल!

रेलवे के नियमों के मुताबिक, एक सहायक लोको पायलट (ALP) RBO/ No – 101 /2008 के तहत 60,000 (साठ हज़ार) किलोमीटर चलाने वाले को ही लोको पायलट (मालगाड़ी) बनाना है और फिर दो वर्ष लगातार लोको पायलट (मालगाड़ी) चलाने वाले को ही लोको पायलट (पैसेंजर) बनाना है, अर्थात दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि लोको पायलट (पैसेंजर) बनने के लिए सालों तक तपस्या करनी पड़ती है, हजारों किलोमीटर गाड़ी दौड़ानी पड़ती है और कड़े इम्तिहानों से गुजरना पड़ता है। लेकिन दानापुर मंडल के कौशलेंद्र अपने खास “यार” अमरेंद्र ( अमरेंद्र कुमार AGM/ECR) के पास से प्राप्त दिव्य शक्ति द्वारा, बिना कोई ट्रेन चलाए, बिना उंगली हिलाए, इन्हें एक नहीं बल्कि दो दो पदोन्नति (प्रमोशन) की सौगात थाली में सजाकर दे दी गई।
भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने का विजय गाथा!

यह कौशलेंद्र अपने यार अमरेंद्र के मदद से मदमस्त हाथी के तरह वगैर रेल कार्य किए वर्षों रेल से वेतन लिए और ले रहे हैं, वगैर ट्रेन चलाए हजारों किलोमीटर भत्ता लिए, वगैर ड्यूटी किए नाईट भत्ता लिए, वगैर ड्यूटी किए ओवर टाइम भत्ता भी लिए, बिहारशरीफ (नालन्दा) में अपने पैतृक घर पर रहकर पटना शहर का HRA वर्षों तक लिए, बिहारशरीफ (नालन्दा) में रहकर ट्रांसपोर्ट अलाउंस लिए,आप सभी हतप्रभ होंगे कि Sr DOM/DNR के निगरानी में रहने वाला CMS के कम्प्यूटर पर बेधड़क सम्पूर्ण फर्जी डाटा को चढवाए,यह इतने मदमस्त थे कि पटना में पदस्थापित दिखाकर (24*7 बिहारशरीफ में रहकर) वगैर राजगीर में उपस्थित हुए वर्षों तक राजगीर रनिंग रूम के प्रभारी भी बनें,वह भी तब, जहां दो कार्यस्थलों के बीच दूरी 150 किलोमीटर (पटना – राजगीर) है।

अमरेंद्र – कौशलेंद्र के भ्रष्टाचार नगरी में काला छाया बनकर आए अमित मोहन!

अमरेंद्र – कौशलेंद्र के भ्रष्टाचार का जमी जमाई व्यवस्था पर ग्रहण लग गया,लोको पायलट से चिकित्सीय विकोटीकृत क्रू कंट्रोलर, अमित मोहन के राजगीर पदस्थापना से। अमित मोहन ने विभिन्न रेलकर्मियों से कौशलेंद्र के भ्रष्टाचार का गोपनीय जानकारी मिलने पर, भौतिक सत्यापन कर वरीय अधिकारी से कारवाई वास्ते Sr DEE OP DNR से लेकर GM/ECR ,CRB और रेलमंत्री भारत सरकार तक लिखित शिकायत किए। अमरेंद्र – कौशलेंद्र की जोड़ी उस शिकायत पत्र को ही आजीवन कारावास दिलाने में सफल रहे, और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले अमित मोहन को Sr DEE OP DNR (यह वही EX.Sr.DEE OP DNR श्रीमान संजीव कुमार है जो धनबाद मंडल में सीबीआई द्वारा रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े गए और जेल जाना पड़ा) के मदद से शिकायतकर्ता को ही आरोपी बनवा दिए।

अमरेंद्र – कौशलेंद्र की यारी,रेल आचरण नियम – 1966, अनुशासन एवं अपील नियम – 1968, DOPT मंत्रालय के आदेश पर पड़ा भारी!

जिस भारतीय रेल के ECR ज़ोन के दानापुर मंडल के राजगीर लाॅबी में चंद मिनट के लेट ऑन ड्यूटी पर 03+03 =06 का वार्षिक वेतन वृद्धि रोक दिया जाता है ईमानदार लोको पायलट का,उसी राजगीर लाॅबी में कौशलेंद्र को पिछले बीस वर्ष से वगैर ट्रेन चलाए बेरोकटोक सभी रेल सुविधाएं। हद तो तब हो गई जब पूरी बीस साल सेवा के दौरान पंद्रह साल पटना में पदस्थापना जबकि राजगीर के रनिंग रूम में अवैध तैनाती वगैर कार्यालय आदेश के, फिर राजगीर में ही इन्हें चीफ़ क्रू कंट्रोलर (TRS, राजगीर) की मखमली कुर्सी पर भी आसीन कर दिया गया था। वरिष्ठ लोको रनिंग कर्मचारी आज़ भी सिर खुजला रहे हैं कि जो इंसान 2006 में सोनपुर मंडल से म्यूचुअल तबादला ( Mutual Transfer) पर दानापुर आया था, उसने वरीयता सूची (Seniority List) की ऐसी “हाई जंप” कैसे मारी? 2006 से 2015 के बीच तीन तीन बार वरीयता सूचियों को जंप कराया गया, मानो रेलवे की सीनियरिटी लिस्ट न हुई, बच्चों का लूडो का खेल हो गया!

हर महीने की “वसूली” और रनिंग रूम की ठेकेदारी!

चर्चा है कि इस कुर्सी और रसूख का इस्तेमाल रेलवे की सेवा के लिए कम, और खुद की “सेवा” के लिए ज्यादा किया जा रहा है। रनिंग कर्मचारियों के जुबान पर इनके काले कारनामों की फेहरिस्त लंबी है। आरोप है कि 5000 से लेकर 7000 रूपए महीना तक की वसूली करना इनकी फितरत बन चुकी है।
लेकिन बात सिर्फ वसूली तक नहीं रूकती।इन अनैतिक कार्यों के साथ साथ यहां “माफिया” स्टाइल में रनिंग रूम की ठेकेदारी का साम्राज्य भी फल फूल रहा है ‌। दानापुर मंडल के तीन -तीन महत्वपूर्ण रनिंग रूम्स ( राजगीर, इस्लामपुर, और बख्तियारपुर) का संचालन इन्हीं की “छत्रछाया” और देख-रेख में में हो रहा है। जो जगह थक- हार कर आने वाले रनिंग स्टाफ के आराम के लिए बनी थी, उसे मुनाफे और रसूख का अड्डा बना दिया गया है।

नाक के नीचे पारदर्शिता का उपहास!

इस पूरे खेल का सबसे दुखद पहलू यह है कि दिन -रात ईमानदारी से पसीना बहाने वाले रनिंग कर्मचारियों में गहरी वेदना, निराशा और आक्रोश है। जो कर्मचारी कड़कड़ाती ठंड और तपती धूप में ट्रेनें दौड़ा रहे हैं,वे आज खुद को “नियति” और इस माफिया राज के भरोसे बेबस महसूस कर रहे हैं।
एक तरफ रेल मंत्रालय और उच्च अधिकारी प्रशासनिक शुचिता का ढिंढोरा पीट रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की मिलीभगत से उसी पारदर्शिता का इतना भयानक और नग्न उपहास उड़ाया जा रहा है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

1973 में आई फिल्म “जंजीर” का प्रसिद्ध गाना ” यारी है ईमान मेरी,यार मेरी जिंदगी….. आज़ दानापुर के TRS/ OP विभाग के इन दोनों महानुभाव पर बिल्कुल सटीक बैठ रहा है बस फर्क इतना है कि गाने के बोल अलग है –

यारी है ईमान मेरा, पर नियत है”बेईमान”,
दानापुर टीआरएस का देखो,यही असली संविधान।
अमरेंद्र और कौशलेंद्र ने, मिलकर कसम यह खाई है,
दोस्ती अपनी पक्की है, पर जेब में दोनों के अवैध कमाई है।
नियम – कायदे रो रहे कोने में, यहां अंधेरगर्दी भारी है,
कहने को तो ये दोनों यार है,पर विभाग पर ये बीमारी है।
कागज़ों पर मेंटनेंस पूरा, असलियत में हैं सब ठप,
सरकारी खजाना खाली करके, दोनों कर रहे डकार -डप।
“जंजीर ” का गाना बदनाम हुआ, इन यारों की करतूतों से,
जांच की फाइलें डरती हैं, इनके रसूख और जूतों से।
ईमान का चोला ओढ़कर, दोनों बन बैठे है भगवान,

*TRS/ OP की यही पुकार – नियम चाहिए, नहीं पक्षपात का व्यापार!”

महाप्रबंधक महोदय से “सच्ची ” अपेक्षा
अब जब पूर्व मध्य रेलवे को नव नियुक्त महाप्रबंधक (GM) मिलने जा रहे हैं तो “Railwellwishers”और दानापुर के पीड़ित कर्मचारियों की निगाहें उनकी ओर टिकी है। देखना यह है कि क्या नए साहब इस “अमरेंद्र – कौशलेंद्र” की जुगलबंदी और इस विभागीय माफिया की गतिविधियों पर ब्रेक लगाते हैं,या फिर दानापुर का यह टीआरएस विभाग इसी तरह “बिना पटरी की गाड़ी” को रिश्वत के ईंधन से दौड़ाता रहेगा?
ईमानदार कर्मचारियों को उम्मीद है कि इस बार अंधेरगर्दी पर विराम लगेगा और “यारी”के नाम पर चल रही इस “बेईमानी” का कड़ा ऑडिट होगा और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।

सफ़र जारी है..

 

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