हाजीपुर:मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काज़ी- जाति- पाती और दोस्ती रेल के नियम क़ानून पर भारी पड़ रहा है । भ्रष्ट बदनाम लेखा विभाग और बदनीयत आरपीएफ की जोड़ी रेलवे के स्थापित नियमों कानूनों से ऊपर है । रेलवे बोर्ड के पत्र दिनांक 30.08.22 के अनुसार HQ (Exe) चयन प्रक्रिया के लिए सीएससी हाजीपुर को नोडल अधिकारी बनाया गया था । परीक्षा कराने वाली एजेंसी के चयन के लिए IREPS पर ₹ 23.94 लाख का एक टेंडर जारी हुआ । कार्य M/S Eduquity Carrier Technologies Pvt Ltd बैंगलोर को आवंटित हुआ । उस संदर्भ का पत्र 25.05.2023 को जारी हुआ ।
संदर्भित पत्र के अनुसार सफल एजेंसी को 21 दिन के भीतर बिना विलंब शुल्क और साठ दिन के भीतर बिलम्ब शुल्क के साथ 10 % का BG जमा करना था उसके अलावा अन्य सभी जरूरी निर्देश थे । 12.07.23 को एग्जाम कराया जाता है और एक हफ्ते में परिणाम घोषित कर दिया जाता है । लेकिन सफल एजेंसी 60 दिन के भीतर 10% BG जमा नहीं कर पाई । नियमतः ये कांट्रैक्ट भी बाक़ी इसी तरह के कार्यों की तरह टर्मिनेट हो जाना चाहिये था लेकिन हुआ क्या ईसीआर का आरपीएफ जो कि अवैध वसूली और सारे दो नंबर के मामले में भारतीय रेलवे में एक नंबर पर है । आश्चर्य होता है कि जो विभाग ग़लत काम करने में इतना माहिर है वो एक अदद सही काम क्यों नहीं कर पाया । नियमों की जानकारी का ना होना एक बहाना बनाया गया । क़ानून की किताबों में एक स्थापित नियम है कि “Ignorantia Juris Non Excusat “ मतलब क़ानून की अज्ञानता या जानकारी ना होना कोई बहाना नहीं है कोई भी अधिकारी या कर्मचारी यह दावा करके अपने दायित्व से नहीं बच सकता ।
खैर जो हुआ वो हुआ एजेंसी कौन थी किसकी थी उसने क्या किया कैसे किया वो सब अगले भाग में ! भारतीय रेल का अनोखा अनदेखा लेखा ने जो आगे किया वो बहुत बड़ी धांधली है और नियमों की धज्जियां उड़ाई गयी ।
किसी भी टेंडर के बाद भुगतान करने के लिये सर्व प्रथम विधीक्षित एग्रीमेंट का होना अनिवार्य होता है और जैसा कि ऊपर बताया गया कि कार्य में नियमों की अवहेलना हुई थी उसके लिए सक्षम प्राधिकार जो कि कम से कम महाप्रबंधक या रेलवे बोर्ड होना चाहिये था उसकी स्वीकृति या अनुमोदन लेना चाहिए था लेकिन यारी दोस्ती रेलवे के नियमों पर भारी पड़ गयी । ऐसे कई मामलों में अनगिनत ठीकेदारों ने अपने मेहनत की गाढ़ी कमाई गवाईं है। लेखा विभाग ने ऐसे मामलों में अनुबंध को निरस्त कराया है और किए गए कार्यों का कोई भुगतान नहीं किया है । EMD तक का पैसा जब्त कर लिया गया है । लेकिन इस मामले इतनी सहानुभूति महाठग भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत के कारण हुआ है । काम हुआ तो भुगतान भी होना चाहिए लेकिन उसके लिए नियम कानून हैं सरकारी तंत्र निश्चित सीमा और कानून से चलता है ना कि किसी की मनमर्जी या मनमौजी से ।
अंधेर लेखा के चौपट राजा के कर्ता धर्ता सहायक सलाहकार राजीव रंजन ने अपने आका के मौखिक आदेश पर दिनांक 16 जनवरी 2026 को एक ही झटके में ₹23.94 लाख का भुगतान कर दिया जाता है ।
इसकी जांच बिल भुगतान संबंधित दस्तावेजों से की जा सकती है । ये नियम विरुद्ध भुगतान है । सक्षम प्राधिकार की अनुमति के बिना राजा के “दुलरुआ” राजीव रंजन ने यह भुगतान कर दिया । सरकारी व्यवस्था में नियमों की अवहेलना कर एक चौपट राजा ने दूसरे चालबाज़ राजा की मदद की । इस तरह का कोई भी भुगतान बिना महाप्रबंधक की पूर्वानुमति के नहीं किया जा सकता है लेकिन आका के हुक्म का तामील किया गया उसके एवज़ में वो अपने पसंद के कर्मचारियों को इधर उधर करने में पैसे की उगाही कर रहा है । प्रशासन और व्यय अनुभाग का सर्वे सर्वा बना हुआ है कर्मचारियों के बीच अपना ख़ौफ़ बनाये हुए है । महाचोर चौपट राजा को अपने गिरफ्त में रखा हुआ है । आम चर्चा है कि राजा का पुराना खासमख़ास है और वो सारे राज जानता है । इसलिए राजा शिकायतों के बाद भी उसके खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं कर पाता ।
“समरथ को नहीं दोष गोसाईं “





