मोदी जी आप कब सुनेंगे रेलकर्मियों के “मन की बात”!

मोदी जी आप कब सुनेंगे रेलकर्मियों के “मन की बात”!

पटना: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” की अब तक कुल 133 कड़ियां पूरी हो चुकी है।133वीं कड़ी का प्रशासन 26 अप्रैल 2026 को किया गया था।यह कार्यक्रम 03 अक्टूबर 2014 से शुरू हुआ था और आमतौर पर हर महीने के अंतिम रविवार को सुबह 11 बजे प्रसारित होता है।

प्रायः अभी तक यह देखने को मिला है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बातों पर लोगों ने ताली ही नहीं थाली भी बजाया है लेकिन लोग अब छाती पीटने को भी मजबूर हो गए हैं क्योंकि लोग उनकी “मन की बात” को तो सुनते हैं और अनुपालन भी सुनिश्चित करते हैं लेकिन क्या वो लोगों के “मन की बात”सुनना सुनिश्चित करते हैं, संभवतः बहुतायत का जबाब यही होगा कदापि नहीं!

दो दिनों पहले की ही बात है, एक आम सभा में उन्होंने उपस्थित आमजनों से एक अपील की!

(1) एक साल तक सोना नहीं खरीदें।
(2)खाने के तेल का इस्तेमाल कम करें।
(3) पेट्रोल, डीज़ल का इस्तेमाल कम करें।
(4) पेट्रोल, डीज़ल के वाहन का इस्तेमाल कम करें, इलेक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल करें।
(5)कार ज़रूरी हो तभी इस्तेमाल करें,कार पुल का इस्तेमाल करें।
(6) सार्वजनिक वाहनों का, यथा बस, ट्रेन का इस्तेमाल करें।

आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी आपने देश हित में अच्छी बात कही लेकिन क्या ये सभी ज्ञान आम जनता के लिए ही है, नेताओं और अधिकारियों के लिए नहीं!
आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय आपके द्वारा समय-समय पर देशवासियों को ईंधन बचत, संसाधनों के उचित उपयोग एवं अनावश्यक वाहन उपयोग कम करने का संदेश दिया जाता रहा है, परन्तु अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि रेलवे में इन दिशा निर्देशों का प्रभावी अनुपालन ज़मीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता है जो कि दुखद ही नहीं शर्मनाक है।

रेलवे के अनेक यूनिटों एवं मंडलों में यह देखा जाता है कि एक ही मुख्यालय से, एक ही समय पर एवं एक ही दिशा में कार्य करने वाले कर्मचारियों एवं अधिकारियों को अलग अलग वाहनों से भेजा जाता है। क्या इस व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश नहीं है! यदि समुचित एवं साझा परिवहन व्यवस्था लागू की जाए तो तो एक यूनिट में प्रतिदिन 1000 लीटर तक तथा एक ज़ोन में 5,000 से 10,000 लीटर तक ईंधन की बचत संभव है। पूरे भारतीय रेलवे स्तर पर यह बचत प्रतिदिन लाखों लीटर तक पहुंच सकती है।

इसके अतिरिक्त मंडल कार्यालयों एवं ज़ोनल मुख्यालयों में प्रतिदिन लगभग समान समय पर आने वाले अधिकारियों के आवास प्रायः एक ही रेलवे कालोनी अथवा आसपास स्थित होते हैं, फिर भी प्रत्येक अधिकारी अलग-अलग सरकारी वाहनों से कार्यालय आते जाते हैं। जबकि एक साझा व्यवस्था लागू कर एक ही वाहन से क्रमवार अधिकारियों को कार्यालय लाया जा सकता है।कई स्थानों पर अधिकारी मात्र 05 मिनट पैदल चलकर भी कार्यालय पहुंच सकते हैं, फिर भी सरकारी वाहनों का उपयोग/दुरूपयोग किया जाता है, जिससे अनावश्यक ईंधन खर्च होता है।

यह भी आरोप एवं शिकायतें प्राप्त होती है कि कुछ स्थानों पर सरकारी वाहनों का उपयोग निजी कार्यों, यहां तक कि बच्चों को स्कूल लाने ले जाने जैसे कार्यों में भी किया जाता है।कई मामलों में रेल कर्मचारियों से ही वाहन चलवाए जाते हैं, जबकि निजी चालक का भुगतान भी दर्शाया जाता है। इससे पारदर्शिता, सरकारी संसाधनों के उपयोग एवं संभावित भ्रष्टाचार पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं।

अतः Railwellwishers का आपसे विनम्र निवेदन हैं कि निम्नलिखित बिंदुओं पर तत्काल कार्रवाई की जाए:

(1) रेलवे के सभी यूनिटों एवं मंडलों में ईंधन उपयोग एवं वाहन संचालन का विशेष ऑडिट कराया जाए।
(2)समान दिशा एवं समान समय में आने जाने वाले कर्मचारियों एवं अधिकारियों हेतु साझा परिवहन व्यवस्था लागू की जाए।
(3) अधिकारियों के आवास से कार्यालय तक अत्यंत कम दूरी होने पर फोर व्हीलर उपयोग सीमित किया जाए तथा पैदल आने की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाए।
(4) सरकारी वाहनों के निजी उपयोग की जांच कर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
(5) रेल कर्मचारियों से गैर – पदस्थ वाहन संचालन की जांच कराई जाए।
(6) सात दिनों के अंदर सर्वे कर यह रिपोर्ट तैयार की जाए कि:

किस अधिकारी/कर्मचारी का मुख्यालय कहां है!

कौन कौन समान दिशा में ड्यूटी हेतु जाते हैं!
कहां साझा वाहन व्यवस्था संभव है!
बिना ट्रांसफर के ईंधन बचत की क्या संभावनाएं हैं!

(7) एक डिजिटल माॅनिटरिंग प्रणाली विकसित की जाए जिससे वाहन उपयोग, ईंधन खर्च एवं यात्रा समन्वय की निगरानी हो सके।
यदि भारतीय रेलवे में ईंधन बचत एवं संसाधन संरक्षण की शुरुआत शीर्ष प्रशासनिक से की जाए, तो इससे न केवल करोड़ों रुपए की बचत होगी बल्कि कर्मचारियों एवं आमजनों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी कम होगा तथा प्रधानमंत्री महोदय के संदेश का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित हो सकेगा।
और अंत मे आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय से सिर्फ यही कहना है कि कहने से नहीं करने से होता है और उम्मीद करते हैं कि आप रेलकर्मियों के” मन की बात” को सुनकर क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे।
उम्मीदें हैं तो जिंदगी है..

और इसी उम्मीद में सफ़र जारी है…

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