ECR: रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की खुली पोल,दो दिन में दो यात्रियों की हत्या !

ECR: रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की खुली पोल,दो दिन में दो यात्रियों की हत्या !

पटना: इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है जब पूर्व मध्य रेलवे, हाजीपुर के आर पी एफ विभाग को इसी वर्ष 09 जनवरी को “सुरक्षा शील्ड” से नवाजा गया था,जबकि पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर को मिले “सुरक्षा शील्ड” पर गंभीर सवाल भी उठा था क्योंकि वर्ष 2025 में शराब तस्करों द्वारा आरपीएफ के दो जवानों की नृशंस हत्या कर दी गई थी, जो विभाग अपने जवानों की भी रक्षा नहीं कर सका, उसे “सुरक्षा शील्ड” से नवाजा गया तो सोच और समझ सकते हैं कि स्थिति कितनी भयावह है।

पूर्व मध्य रेलवे में बीते कुछ दिनों के भीतर हुई लगातार आपराधिक घटनाओं ने रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। ऐसा लगने लगा है कि रेलवे अपराधियों के लिए सबसे आसान और सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है।

सबसे ताजा मामला मुगलसराय (पं दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) रेलखंड का है, जहां जम्मू तवी एक्सप्रेस में एक यात्री की हत्या गोली मारकर कर दी गई। बताया जा रहा है कि बदमाशों ने ट्रेन के भीतर ही वारदात को अंजाम दिया और उसके बाद पूरे रेलवे प्रशासन में हड़कंप मच गया। हैरानी की बात यह है कि यह घटना ऐसे समय हुई जब उससे ठीक पहले इसी रेलखंड पर तारीधाट पैसेंजर ट्रेन में भी हत्या की एक घटना सामने आ चुकी थी।

दो दिनों के भीतर ट्रेनों में लगातार दो हत्याओं ने यात्रियों के मन में भय पैदा कर दिया है।

इसके पहले पटना जंक्शन से एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को मदद का झांसा देकर उठा लिया गया। आरोप है कि उसके साथ कई लोगों ने दुष्कर्म किया और तबियत बिगड़ने पर उसे दानापुर स्टेशन के पास छोड़ दिया गया। राजधानी के सबसे व्यस्त स्टेशन से इस प्रकार लड़की का उठ जाना और घंटों तक सुरक्षा एजेंसियों को भनक तक नहीं लगना बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है।

इसी तरह पटना – गया पैसेंजर ट्रेन में भी एक नाबालिग लड़की को ट्रेन से नीचे उतारकर गैंगरेप की घटना सामने आई। बताया गया कि अपराधियों ने ट्रेन रूकवाकर लड़की को जबरन नीचे खींच लिया।यह घटना दर्शाती हैं कि अब अपराधियों में रेलवे सुरक्षा बल और कानून का डर लगभग समाप्त होता जा रहा है।

इन चारों घटनाओं को एक साथ देखें तो स्पष्ट लगता है कि पूर्व मध्य रेलवे में सुरक्षा व्यवस्था नाम की चीज लगभग खत्म होती जा रही है। यात्री, महिलाएं, और बच्चे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आखिर अपराधियों के अंदर इतना दुस्साहस क्यों बढ़ रहा है?

सूत्रों और चर्चाओं में यह बात सामने आ रही है कि जिस प्रकार बिहार की राजनीति और प्रशासन में कई बार जातीय एवं आर्थिक समीकरण हावी रहते हैं,उसी प्रकार आरपीएफ में भी कई जगह पोस्टिंग और जिम्मेदारियां योग्यता, अनुभव और कार्यकुशलता के बजाय अन्य समीकरणों को ध्यान में रखकर तय की गई। यदि सुरक्षा व्यवस्था में भी यही प्रवृत्ति हावी होगी, तो उसका असर कानून व्यवस्था पर दिखना स्वाभाविक है।

रेलवे प्रशासन और आरपीएफ को अब गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए। रेलवे केवल ट्रेन चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों की सुरक्षा और विश्वास की जिम्मेदारी भी है। यदि समय रहते कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो आम लोगों का भरोसा और विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा।
क्या रेल प्रशासन अपनी आत्ममुग्धता से बाहर निकल पायेगा!

उम्मीद के साथ सफर जारी है…

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