पटना: 1980 के दशक में एक फिल्म आई थी “हम नहीं सुधरेंगे” ठीक वही हाल हो गया है पूर्व मध्य रेलवे के आरपीएफ विभाग का, क्योंकि पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर के महाभ्रष्ट एवं मति भ्रष्ट महाप्रबंधक छत्रसाल सिंह को सिर्फ “गांधी छाप” से मतलब है, गांधी के विचारों से कोई लेना-देना नहीं है! यदि पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर के महाभ्रष्ट एवं मति भ्रष्ट महाप्रबंधक छत्रसाल सिंह को गांधी के विचारों से मतलब होता तो आज़ पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर की दशा और दिशा जो दुर्दशा में तब्दील हो चुकी है, ऐसा नहीं होता!
एक सप्ताह के भीतर बिहार में रेलवे सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली दो घटनाएं सामने आई। पहली घटना देश के भीआईपी स्टेशनों में गिने जाने वाले पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन से जुड़ी है, जहां कथित रूप से नाबालिग लड़की को उठाकर गैंगरेप किया गया। दूसरी घटना गया जी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास की है, जहां चलती ट्रेन से उतारकर नाबालिग बच्ची के साथ सामुहिक दुष्कर्म की घटना सामने आई।
इन दोनों घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर रेलवे यात्रियों, खासकर महिलाओं और बच्चियों के लिए रेलयात्रा कितना सुरक्षित रह गया है!
ऐसे समय में जब रेलवे स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे, आरपीएफ एस्कार्ट, जीआरपी गश्त, सीआईबी निगरानी और आधुनिक सुरक्षा तंत्र होने के दावे किए जाते हैं,तब लगातार हो रही असामान्य और जघन्य घटनाएं बताती है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर खामी है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था होने के बाबजूद अपराधी इतने बेखौफ कैसे हो गए??
रेलवे अब अपराधियों के लिए “सॉफ्ट टारगेट” बनता जा रहा है। स्टेशन परिसरों और ट्रेनों में अवैध हाॅकर, अवैध वेंडर,नशेरी, पॉकेटमार, और संदिग्ध तत्वों की लगातार बढ़ती मौजूदगी यात्रियों की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुकी है।जब किसी क्षेत्र में अनुशासन कमजोर पड़ता है, तो अपराध स्वत: बढ़ने लगते हैं।चोरी, पॉकेटमारी, जहर खुरानी, महिलाओं से छेड़खानी और रेप जैसी घटनाएं उसी अव्यवस्था का परिणाम प्रतीत होती है।
इस स्थिति के लिए केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। रेलवे सुरक्षा व्यवस्था में नेतृत्व और पोस्टिंग नीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि थानों और महत्वपूर्ण पोस्टों पर नियुक्ति “जुगाड़ टेक्नोलॉजी”से होगी, तो उसका असर ज़मीन पर साफ़ दिखाई देगा। एक अयोग्य या भ्रष्ट इंस्पेक्टर अपने स्टाफ को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाता!बीट ड्यूटी कमजोर हो जाती है, गश्त केवल कागजों में सिमट जाती है और अपराधियों का मनोबल बढ़ जाता है।
दानापुर, पटना, जहानाबाद, गया जैसे संवेदनशील रेलखंडों में सुरक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता सीधे तौर पर नेतृत्व पर निर्भर करती है। यदि स्टेशन और ट्रेनों में नियमित निगरानी, संदिग्धों की पहचान और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई हो, तो अपराधों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। लेकिन जब प्राथमिकता वास्तविक सुरक्षा के बजाय केवल आंकड़े सुधारने पर केंद्रित हो जाएं,तब स्थिति और भयावह हो जाती है और वही पूर्व मध्य रेलवे में हों रहा है।
अक्सर देखने में आता है कि मोबाइल चोरी के मामले में बड़ी संख्या में ग़रीब, नशें के आदी,या घुमंतू युवकों की गिरफ्तारी दिखाकर उपलब्धि पेश कर दी जाती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिन हजारों मोबाइलों की बरामदगी का दावा किया जाता है, उनमें से कितने वास्तव में उनके असली मालिकों तक लौटाए गए?? बरामदगी और वास्तविक रिकवरी के बीच का यही अंतर कई सवाल खड़े करता है। यदि चोरी हुए समान का बड़ा हिस्सा पीड़ितों तक वापस नहीं पहुंचता, तो यह केवल “सिक्योरिटी शील्ड”तैयार करने वाला आकंड़ा का खेल प्रतीत होता है जो कि दुखद और शर्मनाक पहलू है।
रेलवे केवल यात्रा का माध्यम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी व्यवस्था है। यदि यात्री, महिलाएं, और बच्चे स्टेशन तथा ट्रेन में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह किसी भी सुरक्षा एजेंसी की सबसे बड़ी विफलता मानी जाएगी। जरूरत है कि रेलवे सुरक्षा तंत्र की निष्पक्ष समीक्षा हों, पोस्टिंग और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए तथा जमीन पर वास्तविक गश्त और निगरानी सुनिश्चित की जाए, वरना सीसीटीवी, एस्कार्ट और सुरक्षा दावों का पूरा तंत्र केवल कागजी व्यवस्था बन कर रह जाएगा।।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इन सब घटनाओं और लगातार बिगड़ती सुरक्षा व्यवस्था के बाबजूद पूर्व मध्य रेलवे के प्रमुख मुख्य सुरक्षा आयुक्त को सेवा विस्तार दिए जाने की चर्चा हो रही है। यदि वास्तव में ऐसा होता है, तो यह “अंधेर नगरी चौपट राजा” वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा होगा। जब अपराध बढ़ रहे हो, यात्रियों को भरोसा टूट रहा हो और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो,तब जवाबदेही तय होने के बजाय विस्तार और पुरस्कार की चर्चा होना व्यवस्था की कार्यशैली पर और भी बड़े प्रश्न खड़ा करता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर रेलमंत्री महोदय किस शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं जब 52 सप्ताह 52 सुधार अभियान की शुरुआत करेंगे।
उम्मीद है तो जिंदगी है और इस उम्मीद में सफ़र जारी है…





