दानापुर: भारतीय रेल को देश की जीवनरेखा कहा जाता है, लेकिन पूर्व मध्य रेल के दानापुर मंडल के विद्युत विभाग के वरीय मंडल विद्युत अभियंता (परिचालन) श्रीमान शिशिर नगरिया,पुरे भ्रष्टाचार तंत्र का मुख्य सरगना है, ने इस जीवनरेखा को एक नया “बिजनेस माॅडल” दे दिया है। यहां भ्रष्टाचार अब कोई छिपा हुआ पाप नहीं है, बल्कि एक सुसंस्कृत “शिष्टाचार” बन चुका है। दानापुर मंडल के नीति निर्धारकों ने स्थानांतरण (Transfer) की प्रशासनिक प्रकिया को एक ऐसा अजूबा, अनुपम और अलौकिक रूप दे दिया है,जिसे देखकर वह कहावत सोते नज़र आयेगी कि “बाप बड़ा न भईया सबसे बड़ा रूपईया”!
इस अलौकिक व्यवस्था की एक ताजा और दिव्य बानगी राजगीर लाॅबी में देखने को मिली है।” गोपनीयता” के पवित्र पर्दे को हटाकर जो सच सामने आया है,वह रेल प्रशासन की शुचिता पर एक करारा व्यंग है। दानापुर मंडल में एक अनोखी “कलेक्शन एजेंसी” चल रही है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, राजगीर लाॅबी के मुख्य चालक नियंत्रक श्रीमान सुबोध कुमार ने एक बेहद “महत्वपूर्ण”और “पवित्र जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने रेलकर्मियों के कल्याण ( या कहें अपने जेब के कल्याण) के लिए पूरे तीन लाख रुपए की एकमुश्त राशि एकत्रित की।
अब पैसा इकट्ठा हुआ है तो उसे सही”देवताओं ” तक पहुंचाना भी तो एक कला है। इसके लिए एक कुशल”कूरियर” की आवश्यकता थी,जिसका दायित्व लोको पायलट पैसेंजर श्रीमान कौशलेंद्र कुमार को सौपा गया। कौशलेंद्र कुमार इस भारी – भरकम “प्रसाद” को लेकर दानापुर मंडल के मुख्यालय में बैठे मुख्य लोको निरीक्षक (HQ/CLI) श्रीमान हरेंद्र सिंह के”चरणों” में अर्पित करने के लिए रवाना हुए।आम जनता को यह जानना महत्वपूर्ण है कि श्रीमान हरेंद्र सिंह पूर्व से ही भ्रष्टाचार के शहंशाह रहे हैं, पहले जुगाड़ के तहत लोको पायलट के पदोन्नति में नंबर बढवाकर 50% वरीयता में छलांग लगा चुके हैं तो बाद के दिनों में अपने करीबी अधिकारी के जुगाड़ – तकनीक से CLI पद पर काबिज हुए हैं, तो दूसरी तरफ यह,वही कौशलेंद्र कुमार है जो अपने पूरे बीस साल से अधिक के रेल सेवा में मात्र 7445 किलोमीटर ही ट्रेन चलाए हैं और रेल के सारे नियमों को ताख पर रख कर सहायक लोको पायलट से लोको पायलट पैसेंजर तक बेरोकटोक पदोन्नति लेकर बैठे है और ये सब इनकी कूरियर सेवा और चाटुकारिता का ही तो इनाम है। और तो और ट्रेन चलाने की बजाए रनिंग रूम राजगीर का इंचार्ज बनकर रनिंग रूम में प्याज छिलने के लिए ये रेल से प्रतिमाह लाखों रुपए ले रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि इस भारी -भरकम राशि का उद्देश्य क्या है? क्या यह रेलवे के विकास के लिए कोई गुप्त चंदा है? जी नहीं, यह दानापुर मंडल के विद्युत विभाग प्रधान नगरिया का सुप्रसिद्ध “स्टे- ऑर्डर (Stay Order) योजना” की दूसरी किस्त का हिस्सा है। आज़ से लगभग दस महीने पहले आदेश संख्या 692/2025 के तहत दिनांक 03.10.2025 को राजगीर से झाझा के लिए सात रेलकर्मियों का स्थानांतरण हुआ था। लेकिन दानापुर मंडल के जादूगरों के पास ऐसी विद्या है कि वे कागज़ पर हुए ट्रांसफर को महीनों तक जमीन पर उतरने ही नहीं देते।
इस विद्या का लाभ उठाने वाले तीन महानुभाव है – श्रीमान पंकज, श्रीमान अभिषेक रंजन और श्रीमान रंजय कुमार।ये तीनों पिछले दस महीनों से ट्रांसफर ऑर्डर जेब में लेकर घूम रहे हैं, लेकिन मजाल है कि राजगीर की धरती छोड़कर झाझा चले जाएं! क्यों जाएं भाई? जब तक जेब में हरी पत्तियां है,तब तक झाझा की गर्मी झेलने की क्या जरूरत है? दस महीने से स्थानांतरण के बाबजूद विरमित न होना रेलवे के इतिहास में किसी चमत्कारी शोध से कम नहीं है।
दानापुर मंडल कार्यालय की कार्यप्रणाली भी किसी सुव्यवस्थित लोकतंत्र जैसी हैं, जहां हर स्तर पर “न्यायसंगत” बंटवारा होता है। राजगीर से चला यह रिश्वत का “गंगाजल” जब मुख्यालय पहुंचेगा, तो वहां किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा।पद, प्रतिष्ठा और भ्रष्टाचार में संलिप्तता की “हैसियत” के अनुसार इसे पूरी ईमानदारी से बांटा जाएगा। भ्रष्ट अधिकारी, सुपरवाइजर, मिनिस्ट्रियल स्टाफ से लेकर कर्मचारियों के हकों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले ECREU मान्यता प्राप्त यूनियन के तथाकथित भ्रष्ट नेता तक – सबका हिस्सा तय है।यह समाजवाद का सबसे अनूठा उदाहरण है, जहां “कमाए कोई और,खाए हर कोई”।
लोको पायलटों का काम ट्रेन को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाना होता है, लेकिन यहां मुख्य चालक नियंत्रक और लोको पायलट मिलकर भ्रष्टाचार की गाड़ी को बिना किसी सिग्नल और ट्रैक के, पूरी रफ्तार से दौड़ा रहे हैं।आम जनता सोचती है कि ट्रेनें बिजली के तारों (OHE) से चलती है, लेकिन दानापुर मंडल के विद्युत विभाग ने साबित कर दिया है कि असली गाड़ी तो “रिश्वत के ईंधन” से चलती है और इस ईंधन को लेने देने और लेने की लाईन लगी है।
विडम्बना यह है कि जो विभाग रेल सुरक्षा, अनुशासन और निष्पक्ष प्रशासन का दावा करता है, उसी पर यदि ऐसे आरोप लगे तो यह केवल कुछ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे संस्थागत ढांचे की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
यदि वास्तव में किसी कर्मचारी को स्थानांतरण से बचाने के लिए धन एकत्र किया जा रहा है, तो यह केवल रिश्वत नहीं, बल्कि उन हजारों कर्मचारियों के साथ विश्वासघात है जो नियमों के अनुसार सेवा करते हैं। ऐसे कथित तंत्र में स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि कमाई का अवसर बन जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह सब अकाट्य कटू सत्य है, तो इसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराकर सच्चाई जनता के सामने क्यों नहीं लाई जाती? और यदि सत्य है तो क्या रेलवे प्रशासन यह स्वीकार करेगा कि उसका स्थानांतरण तंत्र अब सेवा नियमों से नहीं, बल्कि धन-बल से संचालित हो रहा है?
यह पूरी व्यवस्था उन ईमानदार रेल कर्मचारियों के मुंह पर तमाचा है जो दिन-रात ईमानदारी से ड्यूटी करते हैं। दानापुर मंडल का यह “स्थानांतरण उद्योग” चीख- चीखकर कह रहा है कि नियम- कानून सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए है, असली व्यवस्था तो “दाम बनावे काम” के सिद्धांत पर टिकी है। देखना यह है कि इस अलौकिक भ्रष्टाचार के अंधकार को दूर करने के लिए विजिलेंस और उच्च प्रशासन की आंखें कब खुलती हैं,या फिर वे भी इस “शिष्टाचार” के अमृतपान में मग्न रहते हैं।
सफ़र जारी है…





