एम भी आई ( MVI)

एम भी आई ( MVI)

पटना:शीर्षक देख प्रथमदृष्टया आप यही समझेंगे कि मैं मोटर वाहन निरीक्षक की बात कर रहा हूँ।
कहानी के पात्र निरीक्षक ही हैं पर मोटर वाहन वाले नहीं।

निरीक्षक का पद जिसे अंग्रेजी में इंस्पेक्टर ही कहते हैं, अंग्रेजों के द्वारा सृजित पद है और अंग्रेजों के शासन काल से संघीय और राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में होते थे। यथा – आरक्षी निरीक्षक जिसे पुलिस इंस्पेक्टर कहते हैं। उसी तरह भोज्य पदार्थ निरीक्षण हेतु – फूड इंस्पेक्टर, खनन हेतु – माइंस् इंस्पेक्टर आदि, आदि होते थे।

रेलवे मे भी कार्यानुरूप इंस्पेक्टर के पद सृजित थे,अब इन पदों का नया नामकरण किया गया है।
वैसे, यह कथा रेलवे विभाग से जुड़ी नहीं है फिर भी यदि कोई समानता इस कथा से मिलती जुलती हो तो यह संयोग मात्र ही हो सकता है।

अब मूल कथा की तरफ आते हैं।

अखिल भारतीय सेवा के एक नये अधिकारी की पदस्थापना जिला मुख्यालय से दूर अनुमंडल स्तरीय कार्यलय मे हुई। नया नया पद मिला था, खूब रुआब था। पूरे क्षेत्र मे उनका रुतवा था। साहब अकड़ु स्वभाव के थे और चमचागीरी- चापलूसी से दूर रहते थे।

चापलूसों की कमी इस धरा पर नहीं है सो उस जगह पर उस विभाग में भी नहीं था। वहाँ चापलूसों की चौकड़ी थी।चापलूस भी एक से बढ़कर एक, सब अपने आप मे विशिष्ट। कौन कम, कौन जयादा- कहना बहुत ही कठिन था। उनमे आपसी सहयोग, तालमेल भी खूब था पर प्रतिस्पर्धा भी बहुत थी।
कहने को सब मे आपसी प्रतियोगिता बहुत थी पर अफसर को फँसाने में सबकी अनोखी एकता हो जाती थी,ऐसा कोई अफसर बना नहीं कि जो उस जगह पर चापलूसों के चौकड़ी के चक्रव्यूह में न घिरे।

जब तक नया अफसर उन चांडाल चौकड़ी के चक्कर में नहीं फंसता, तब तक उसका काम करना मुश्किल होता था और कड़क से कड़क अफसर भी उनके चमचागीरी के चक्रव्यूह में बिना फंसे हुए बाहर निकल ही नहीं पाता था।
वे सब किसी न किसी जुगाड़ से अफसर को अपने चंगुल में फ़ंसा ही लेते थे। वे बड़ी आसानी से नये साहब की कुंडली निकाल लेते थे,कहाँ के, किस बिरादरी के हैं, कहाँ से पढ़े हैं, माता- पिता, भाई- बहन, दोस्त- यार, साले और ससुरालवालों तक की खोज- खबर ले लेते थे और सब तरफ से जाल फेंकते थे, नहीं फंसे, तो सीधे मैडम को पकड़ लिया और उनको कुछ महँगे उपहार देकर अपने पक्ष में कर लिया और नहीं तो फिर किसी गलती के लिए उनके बड़े साहब से डांट खिलवा दिया।

एक बार हुआ यूँ कि साहब बीमार पड़ गये थे। अनुमंडल अस्पताल मे दिखाया, बीमारी कुछ खास नहीं थी फिर भी डाक्टर से कहकर कुछ विशेष जाँच लिखवा लिया जो मण्डलीय अस्पताल मे होता था। सोचा था, इसी बहाने मुख्यालय भी घुम लेंगे, मैडम भी शहर घुम लेंगी, थोड़ा मन बदल जायेगा और बड़े साहबों से मुलाकात भी जायेगी अलग से।

यह सोचकर मूत्र जाँच भी लिखवा लिया कि क्योंकि मूत्र का नमूना तो सबेरे सबेरे का ही देना पड़ेगा।
कार्यक्रम बन गया, मैडम भी खुशी खुशी तैयार हो गयी और गाड़ी भी तैयार हो गयी, गाड़ी पर बैठने ही वाले थे तभी वायरलेस पर सूचना आई कि क्षेत्र में सड़क दुर्घटना गयी है, इस पर साहब थोड़ा विचलित हो गये पर अपने अधीनस्थ MVIs को दुर्घटनास्थल पर रवाना होने का आदेश देकर ख़ुद मंडलिय शहर को रवाना होने को तत्पर हो गये।

इस समय तक साहब चांडाल चौकड़ी के चक्रव्यूह में फंसे नहीं थे ,सो उनमे से किसी ने मुख्यालय के बड़े अधिकारी को उस दुर्घटना और साहब को मंडल जाने की ख़बर दे दी।

साहब निकलने ही वाले थे तब तक ऊपर से वायरलेस से खबर आ गई कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से वहाँ जाना होगा।
साहब कुढ़ गये और उनसे ज्यादा उनकी श्रीमतीजी ग़ुस्से में थी।

मैडम के कहने से साहब ने अपने से बड़े साहब को मंडलीय शहर आने का अपना प्रयोजन बताया।
साहब डांट कर बोले- अरे तुम से तीन टर्म पहले मैं भी वही था। मैं भी मुख्यालय आने के लिए उसी डाक्टर से ऐसा पर्चा बनवाता था।
बेटे, तुम बहानेवाजी बंद करो, बाद में मैं तुम्हें किसी काम से बुला लूँगा, शहर दो तीन दिन घुम लेना। अभी मौके पर जाकर मुयायना कर मुझे रिपोर्ट करो।
साहब ने एक और बहाना जोड़ दिया, सर,मैडम ने गर्भवती होने की शंका व्यक्त की है – उनका भी जाँच कराना था।
बड़े साहब भी कम नहीं थे। वो भी यह सब कर चुके थे, बोले- अरे, तेरे मुख्यालय मे वो चार इंस्पेक्टर हैं न ?

जी सर।

किसी को मैडम के यूरिन का नमूना लेकर भेज दो।

सर, ये अच्छा नहीं लगेगा। किसी इंस्पेक्टर को यूरिन ले जाने के लिए कैसे कह सकता हूँ?
अरे, वो सब छोड़ो। देखो- तुम एक को बोलोगे, वो चारों आपस में लड़ जायेंगे कि मैं ले जाऊंगा, मैं ले जाऊंगा।
सामने एक इंस्पेक्टर भी थोड़ी दूर खड़ा होकर, ये सब बातें सुन रहा था पर ऐसे दिखा रहा था कि जैसे कुछ सुना ही नही।

साहब ने पास बुलाया, थोड़ा झिझक कर अपनी बात कही।पर, सामने वाला इंस्पेक्टर बिल्कुल नही झिझका और बिना किसी संकोच के बोल पड़ा- साहब, इसमें संकोच की क्या बात है? आप क्यों इतना झिझक रहे हैं? हम लोग तो इसी सेवा के लिए आपके साथ हैं। फील्ड मे काम करने लिये और भी इंस्पेक्टर हैं सर।आप यूरिन ले जाने की बात कहने में संकोच कर रहे है, हम तो उससे ज्यादा बड़ी चीज भी जाँच के लिए मुख्यालय ही नहीं, राजधानी तक बर्फ के डब्बे मे सुंदर पैकिंग करा कर ले गये हैं।

“हम तो इसी काम के लिए बने हैं. हुकुम करें जहांपनाह, मेरे आका.” ऐसा कहते हुए, कमर से लगभग 90 डिग्री तक झुक गया और नीचे उनके जुते की तरफ़।

आप आदेश करिये सर, हम MVI तैयार हैं सर।

अब कहानी की शीर्षक समझे?
MVI माने-“मल मूत्र वाहक इंस्पेक्टर”।

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  1. Rishabh Singh

    यह लेख अफ़सरशाही के उस कड़वे सच को उजागर करता है जहाँ नियम सिर्फ़ नीचे वालों के लिए होते हैं और ऊपर वालों के लिए “जुगाड़”। चापलूसी, डर और स्वार्थ के जाल में फँसा सिस्टम न इंसानियत देखता है, न ज़िम्मेदारी।

    व्यंग्य नहीं, यह व्यवस्था की नग्न सच्चाई है।

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