ECR: ‘सहाय’ का अपना काम न करने का “भ्रष्टाचारी उपाय”, और आम मेहनती कर्मचारी काम के बोझ तले कर रहे हाय – हाय!

ECR: ‘सहाय’ का अपना काम न करने का “भ्रष्टाचारी उपाय”, और आम मेहनती कर्मचारी काम के बोझ तले कर रहे हाय – हाय!

दानापुर: दानापुर मंडल की व्यवस्था में इन दिनों एक ऐसा प्रकरण चर्चा में हैं, जिसमें एक वरीय सहायक लोको पायलट राजेश नंदन सहाय,EMP No 27404672831, के काम करने के तरीके और उन्हें मिलने वाली कथित विशेष सुविधाओं को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतों में Sr DEE/ OP/ DNR श्रीमान शिशिर नागरिया , AGM/ ECR/HJP श्रीमान अमरेन्द्र कुमार तथा मंडल रेल अस्पताल दानापुर की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
बेशक, किसी व्यक्ति को जांच से पहले भ्रष्टाचारी घोषित करना उचित नहीं है। लेकिन जब सवाल CMS रिकाॅर्ड , ट्रेन परिचालन, मेडिकल फिटनेस, ड्यूटी आवंटन और सरकारी व्यवस्था से जुड़े हों, तो ज़बाब भी रिकाॅर्ड से ही मिलना चाहिए।

दस साल में 923 किलोमीटर – ट्रेन से ज्यादा कुर्सी से रिश्ता ?

शिकायत के अनुसार श्रीमान राजेश नंदन सहाय वर्ष 2016 से दानापुर में पदस्थापित है और लगभग दस वर्षों की अवधि में उनके द्वारा मात्र 923 किलोमीटर ट्रेन परिचालन किए जाने का दावा किया जा रहा है।

अब सवाल सीधा है –

अगर पद सहायक लोको पायलट का है और मूल काम ट्रेन परिचालन है, तो दस वर्षों में ट्रेन से इतनी कम मुलाकात कैसे हुई?
क्या उन्हें लगातार Office Duty दी गई?
क्या कोई विशेष प्रशासनिक आदेश था?
क्या Medical कारण था?
या फिर कोई ऐसा “विशेष रास्ता” था, जिससे रनिंग स्टाफ बिना ज्यादा ट्रेन चलाए भी अपनी नौकरी की गाड़ी आराम से चला सके?
यही वह सवाल है जिसका उत्तर CMS और ड्यूटी रिकाॅर्ड दे सकते हैं।

शिकायत हुई तो मेडिकल का “सिग्नल” क्यों जलने लगा?

शिकायतों के अनुसार जब श्रीमान सहाय की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे, तो दिनांक 13 मई 2026 से 14 अगस्त 2026 तक उनके Sick रहने की स्थिति सामने आई।
फिर दिनांक 16 अगस्त 2026 को भूली, धनबाद में यातायात प्रशिक्षण के लिए भेजे जाने की जानकारी है। प्रशिक्षण पूरा होने से पहले 24 अगस्त 2026 को विरमित किए जाने की बात सामने आती हैं और इसके बाद फिर दानापुर में Medical/Sick Status का घटनाक्रम बताया गया है।

व्यंग्य में कहें तो –

ड्यूटी का बुलावा आया तो मेडिकल, ट्रेनिंग का बुलावा आया तो मेडिकल, और रनिंग की बारी आई तो मेडिकल – सहाय के लिए मेडिकल का टाइम टेबल कहीं ड्यूटी रोस्टर से ज्यादा पक्का तो नहीं?
हालांकि वास्तविक बीमारी का सम्मान होना चाहिए, किसी कर्मचारी की बीमारी का मजाक बनाना न उचित है और न ही न्यायसंगत। लेकिन यदि कोई शिकायत यह आरोप लगाती है कि Medical व्यवस्था का इस्तेमाल ड्यूटी से बचने के लिए किया गया है, तो फिर Medical Records की स्वतंत्र जांच तो बनती ही है।

अस्पताल में एक घंटा, बाकी समय कहां?

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित कर्मचारी प्रतिदिन सीमित समय के लिए मंडल रेल अस्पताल दानापुर में दिखाई देते हैं और शेष समय अपने निजी आवास पर रहते हैं।
यदि यह दावा सही है तो सवाल उठता है –
Medical Records क्या कहता है?
क्या ये वास्तव में Indoor Patient थे?
क्या इन्हें Home Rest दिया गया था?
क्या उन्हें नियमित Medical Review के लिए बुलाया गया था?
उनकी Medical Condition क्या दर्ज की गई?
इन सवालों का जबाब अनुमान से नहीं बल्कि Admission Register, Indoor Patient Record,Sick Memo, Medical Certificate, CMS Entry, और Medical Board Record से मिलना चाहिए।
और सबसे बड़ी बात यह है कि जो 10 मिनट खड़ा रहने पर ही चक्कर खाकर गिर पड़ता हों,वह प्रतिदिन अस्पताल से आवास और आवास से अस्पताल दुपहिया वाहन से कैसे आवागमन कर रहा है, कहीं ये प्रशासन के आंखों में धूल झोंक तो नहीं रहा या फिर रेल प्रशासन और अस्पताल प्रशासन द्वारा इनको मौन सहमति प्राप्त हैं, आखिर प्रशासन को इनसे क्या लाभ है और इन्हें प्रशासन से क्या लाभ है,इसकी निष्पक्ष जांच तो अवश्य ही होनी चाहिए।

शिशिर नागरिया और अमरेंद्र कुमार की भूमिका पर भी सवाल!

शिकायत में Sr..DEE /OP/DNR श्रीमान शिशिर नागरिया और AGM/ ECR/HJP श्रीमान अमरेन्द्र कुमार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
आरोप यह है कि उनके प्रभाव अथवा प्रशासनिक संरक्षण के कारण श्रीमान सहाय को लंबे समय तक उनके मूल रनिंग कार्य से अलग रखने की सुविधा मिली।
यदि ऐसा कोई आरोप है तो उसका परीक्षण भी रिकाॅर्ड से होना चाहिए –
किस अधिकारी ने Office Duty दी?
किस आदेश के तहत दी?
किस नियम के तहत दी?
Medical Status के आधार पर कौन सा Duty Restrictions लगाया गया?
किस अधिकारी ने उसे स्वीकृत किया?
क्या यही सुविधा अन्य समान पद के कर्मचारियों को भी दी गई?
अगर सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है तो रिकाॅर्ड श्रीमान शिशिर नागरिया और श्रीमान अमरेन्द्र कुमार सहित सभी अधिकारियों को स्पष्ट रूप से निर्दोष साबित कर सकते हैं।
और यदि नियमों से हटकर कोई विशेष सुविधा दी गई है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

आम कर्मचारी करें तो “ड्यूटी”,खास मामला हो तो “व्यवस्था”?

रेलवे में सामान्य कर्मचारी के लिए नियमों की लंबी सूची है।
समय पर ड्यूटी करो।
रोस्टर का पालन करो।
Medical Leave का नियम मानो।
Training पूरी करो।
Running Duty करो।
लेकिन यदि किसी मामले में वर्षों तक मूल कार्य से अलग रहने की शिकायत सामने आए और उसके बाद Medical तथा Training के बीच लगातार ऐसी परिस्थितियां बनती रहें, जिनसे Running Duty टलती रहें, तो आम कर्मचारी के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है –
क्या नियम सबके लिए एक है या किसी -किसी के लिए नियमों के बीच VIP लेन भी हैं?
यही भावना कर्मचारियों को बेबस बनाती है।

923 किलोमीटर बनाम दस साल की नौकरी!

923 किलोमीटर का आंकड़ा इस कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य बन गया है।
यदि यह आंकड़ा सही है तो दस साल में ट्रेन परिचालन से संबंधित पद पर रहते हुए इतनी कम रनिंग के पीछे का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि –
ट्रेन पटरियों पर दौड़ती रही,
सहाय साहब फाइलों में दौड़ते रहे,
मेडिकल फ़ाइल अस्पताल में चलती रही,
और आम कर्मचारी ड्यूटी के बोझ तले दौड़ता रहा!
और अंततः मेडिकल विकोटीकृत का रास्ता साफ हो जाए!
यह केवल एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक कर्मचारी की वास्तविक ड्यूटी और दूसरे कर्मचारियों के वर्क लोड में असमानता पैदा हो सकती है।

असली “हीरो” कौन – CMS या कुर्सी?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा फैसला कोई व्यक्ति नहीं , बल्कि CMS डाटा करेगा।
यदि CMS बताता है कि श्रीमान राजेश नंदन सहाय ने वास्तव में ट्रेन चलाई, Office Duty की, Training की, और Medical Leave पर रहें , तो पूरा मामला स्पष्ट हो जाएगा।
लेकिन अगर CMS में रिकाॅर्ड अधूरा है तो दूसरा सवाल खड़ा होगा –
रिकाॅड अधूरा क्यों है?
वर्ष 2011 से वर्तमान तक CMS Data में यदि इनका रिकाॅर्ड अधूरा/उपलब्ध नहीं है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
क्या डाटा कभी बदला गया?
क्या Manual Correction हुआ?
क्या कोई Entry Delete अथवा Modify किया गया?
किस अधिकारी ने की?
किसकी अनुमति से की?
यही वे प्रश्न है जिनसे किसी भी कथित भ्रष्टाचार की वास्तविकता सामने आ सकती है।

आम मेहनती कर्मचारी कर रहे हाय – हाय!

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अगर कोई कर्मचारी नियमों के अनुसार लगातार कठिन Running Duty करता है, तो उस पर काम का बोझ बढ़ता जाता है ।
और अगर किसी अन्य कर्मचारी को लंबे समय तक Running Duty से बाहर रहने की व्यवस्था मिलती है, तो मेहनती कर्मचारी के मन में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
वह सोचता है –
हम नियम निभाते – निभाते थक गए और कोई नियमों से बचने का रास्ता ढूंढकर आराम कर रहा है – तो मेहनत की सजा और व्यवस्था की कृपा आखिर किसके हिस्से में हैं?
यही भावना किसी भी संस्थान के लिए सबसे ख़तरनाक है।

अब “जांच एक्सप्रेस” चलनी चाहिए!

इस मामले में किसी को भी पहले से दोषी घोषित करने की जरूरत नहीं है।
बस इतना कर दिया जाए कि –
CMS खोलिए ।
Duty Register खोलिए ।
923 किलोमीटर का हिसाब देखिए।
Office Duty Orders निकालिए।
Medical Records देखिए।
Medical Board की रिपोर्ट देखिए।
भूली ट्रेनिंग स्कूल का रिकाॅर्ड देखिए।
24 अगस्त 2026 का Spare Order देखिए।
और फिर देखिए कि नियम किसके लिए कितना चला।
अगर सब कुछ सही निकला तो शिकायत करने वाले सवालों के जबाब पा जाएंगे।
और अगर रिकाॅर्ड में नियमों से हटकर विशेष सुविधा, रिकाॅर्ड में गड़बड़ी अथवा किसी अधिकारी – कर्मचारी की मिली-भगत सामने आती हैं, तो फिर कारवाई भी उसी गंभीरता से होनी चाहिए।

आखिर में

रेलवे की ट्रेन सिग्नल देखकर चलती है।
प्रशासन भी नियम देखकर चलना चाहिए।
श्रीमान राजेश नंदन सहाय
श्रीमान शिशिर नागरिया
श्रीमान अमरेन्द्र कुमार
और मंडल रेल अस्पताल दानापुर से जुड़े इस पूरे प्रकरण में सवाल किसी व्यक्ति के चरित्र पर नहीं, बल्कि रिकाॅर्ड और निर्णय प्रक्रिया पर उठ रहे हैं।
क्योंकि अगर जांच में सब कुछ नियम सम्मत निकला तो संदेह समाप्त होना चाहिए।
और यदि किसी “विशेष व्यवस्था” के पीछे सचमुच कोई भ्रष्ट तंत्र छिपा है,तो उसे भी सामने आना चाहिए।
वरना आम मेहनती कर्मचारी यही सोचता रहेगा –
हमारे लिए ड्यूटी का रोस्टर है,
किसी और के लिए मेडिकल का रास्ता है,
हम ट्रेन चलाकर थक रहे हैं
और कोई नियमों से बचकर आराम कर रहा है –

फिर न्याय की ट्रेन किस प्लेटफार्म पर खड़ी हैं??
सफ़र जारी है..

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