- CBI के तूफान से “चमत्कारी” बचाव और जुगाड़ की नई फसल !
पटना: पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के गलियारों से ईमानदारी की एक ऐसी “अनोखी” कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर आधुनिक चाणक्य भी शरमा जाएं। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक परम प्रतापी अधिकारी, श्री अमन कुमार (DEE/OP/DDU), दिनांक 02/03/2025 को सीबीआई (CBI) रूपी आए भयंकर तूफान से किसी तरह “चमत्कारी” रूप से बच निकले। तूफान थमा तो तबाही रुकनी चाहिए थी, लेकिन यहां तो खेल ही पलट गया। आरोप है कि उन्होंने मंडल रेल प्रबंधक (DRM/ DDU) के साथ मिलकर भ्रष्टाचार की ऐसी मखमली घास उगाई और उसकी जड़ें इतनी गहरी जमा लीं कि ट्रांसफर के आदेश भी बेअसर हो गए। आलम यह रहा कि पिछले 8 महीनों से एक ही कुर्सी पर, एक ही पद पर दो-दो साहब बैठकर देश की सेवा (या मेवा?) का लुत्फ उठा रहे हैं।
आकाओं की सेवा का मेवा: ट्रांसफर रोकने और बुलाने का अद्भुत खेल!
इस अनमोल रत्न को बचाने के लिए DRM/ DDU से लेकर GM/ ECR तक, पूरे तंत्र ने दिन-रात एक कर दिया। आख़िरकार इतनी जी-तोड़ मेहनत बनती भी है! जब कोई अधिकारी रेल को ऐसा “विशेष फायदा” पहुँचा रहा हो, तो उसे आंखों का तारा बनाना तो लाजिमी है। अब यह फायदा चाहे छोटे कर्मचारियों को चार्जशीट का डर दिखाकर अवैध उगाही का हो, या फिर ट्रांसफर-पोस्टिंग के धंधे को ‘प्रशासनिक आवश्यकता’ का सुंदर रंग देने का हो। स्थानांतरण रोकने, भेजने और फिर से वापस बुलाने के नाम पर जो अद्भुत खेल चल रहा है, वह किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है।
अब जनता और रेल के समझदार लोग यह सोचकर परेशान हैं कि यह सारा पुरुषार्थ रेलवे के राजस्व (Rail Revenue) को बढ़ाने के लिए हो रहा है, या फिर हुजूर और उनके परम पूज्य आकाओं की जेबों के कुएं को भरने के लिए? तभी तो शायद इस ‘खास’ अधिकारी का ट्रांसफर पूरे 15 महीने तक फाइल दबाकर रोका गया, जबकि महज 8 महीने पहले आए एक सीधे-साधे अधिकारी फूल कंवर का पत्ता साफ कर उन्हें विदा कर दिया गया।
नियमों का तराजू: आम कर्मचारियों के लिए फांसी, रसूखदारों के लिए एसी केबिन
रेलवे का कानून बड़ा ही ‘न्यायप्रिय’ है- कम से कम कागजों पर तो ऐसा ही दिखता है। नियम कहता है कि अगर किसी अदने से कर्मचारी का ट्रांसफर हो जाए, तो नियम उसी सेकंड से लागू हो जाता है। उसे बोरिया-बिस्तर समेटकर तुरंत निकलना पड़ता है। लेकिन क्या कोई बताएगा कि जब एक रसूखदार साहब 15 महीनों तक सरेआम नियमों का कत्ल करके एक ही मलाईदार जगह पर जमे रहते हैं, तो क्या रेलवे की नियम-पुस्तिका मौन व्रत पर चली जाती है? क्या उन पर ट्रांसफर का कोई नियम लागू नहीं होता, या नियमों की आत्मा सिर्फ छोटे कर्मचारियों को सताने के लिए ही जागती है?
लोकपाल का खौफ और आनन-फानन में ‘जीएम अवार्ड’ का झुनझुना!
सुना है कि DRM/ DDU ने साहब की पीठ थपथपाते हुए ऊपर सिफारिश भेजी है कि रनिंग विभाग में इनका कार्य “अत्यंत उत्कृष्ट” है और ये रेलवे को छप्पर फाड़कर आर्थिक लाभ दे रहे हैं। असल कहानी तो यह है कि अंदर खाने डर बैठा हुआ है कि कहीं लोकपाल (Lokpal) की नजर इस करामात पर न पड़ जाए और चोरी पकड़ी न जाए। बस, इसी डर का इलाज करने के लिए आनंद-फानन में, आन बान और शान के साथ अमन कुमार को “जीएम अवार्ड” (GM Award) देने की मुनादी करवा दी गई।
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और हुजूर को अवार्ड मिले भी क्यों ना? जब दूसरों की जेबों पर डाका डालकर, अपने पद और पावर का नंगा नाच दिखाकर, खुद का और अपने आकाओं का खजाना कुबेर के धन से भी बड़ा किया जा रहा हो, तो ऐसे सिस्टम में “जीएम अवार्ड” तो बहुत तुच्छ और छोटी-मोटी बात है। यह पूरा तमाशा चीख-चीख कर कह रहा है कि जहां रसूख और सांठगांठ हो, वहां नियम सिर्फ फाइलों में दफन होने के लिए होते हैं।
बताते चले की पूर्व मध्य रेलवे (ECR) के वर्तमान महामहिम महाभ्रष्ट एवं मति भ्रष्ट महाप्रबंधक श्री छत्रसाल सिंह (IRTS, 1988 बैच) का सेवानिवृत्ति 31 अगस्त 2026 को तय है।
अब देखने वाली बात यह है की वर्तमान महाप्रबंधक जाते जाते अंतिम समय में श्री जी. बी. पंत द्वारा कहे इन शब्दों को सार्थक कर जाते है या नहीं की “लोकतंत्र में व्यक्ति को अपने लिए कम तथा औरों के लिए ज़्यादा फिक्र करनी चाहिए। यहां खंडित निष्ठा के लिए कोई जगह नहीं है। सारी निष्ठाएं केवल राज्य पर केंद्रित होनी चाहिए। यदि किसी लोकतंत्र में आप प्रतिस्पर्धी निष्ठाएं रख देते हैं या ऐसी व्यवस्था खड़ी कर देते हैं जिसमें कोई व्यक्ति या समूह अपने अपव्यय पर अंकुश लगाने की बजाय बृहत्तर या अन्य हितों की ज़रा भी परवाह नहीं करता, तो ऐसे लोकतंत्र का डूबना निश्चित है।“
उम्मीद में सफ़र जारी है..





