कार्मिक विभाग हर सरकारी महकमों में होता है, सो रेलवे में भी है। ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं, सबको पता है, कार्मिक के काम क्या है और उसके काम काज के तरीके क्या हैं। अन्य विभाग की तरह यहाँ भी अच्छे और बुरे कर्मचारी हैं ,पर कार्मिक विभाग में अच्छे कितने हैं- इसके लिए आपको शोध ही नहीं गहन शोध करना पड़ेगा ।
हर विभाग सुधार की प्रक्रिया से गुज़रता है, पर सुधार की प्रक्रिया यहाँ से गुजरते हुए ख़ुद- ब- खुद विकृत हो जाती है। कहीं दाल में काला होता है पर यहाँ पूरी की पूरी दाल ही काली है। व्यवस्था किसी सड़े हुए बज बजाते नाले की तरह जिसमें कोई मरा हुआ पशु फेंका गया हो।
यह विभाग मृतात्मा के द्वारा ही संचालित होता है- जिसके कर्मियों में मानविकी मूल्य एवं संवेदना मरी हुई है। इस विभाग के कर्मी गिद्ध, चील, कौवा से भी गए गुजरे जो मृत शरीर का मांस भक्षण करते हैं पर यहाँ के कार्मिक जिंदा लाचार कर्मचारियों का भक्षण करते हैं । शोषण इतना कि कर्मी अपना देह भी बेच दे तो भी इनका पेट नहीं भरने वाला।
दुहने मे किसी ग्वाला को मात दे, नोचने मे गिद्ध को भी मात दे दें। नियम कानून का ऐसा डंडा कि आदमी खुद को फंदा पर चढ़ाने में शांति मिले।
कहने को यह विभाग मंडल एवं ज़ोन स्तर सीधी भर्ती वाले ग्रुप A अधिकारियों द्वारा संचालित होता है पर लोगों को शायद यह नहीं पता कि ये ग्रुप-A अधिकारी खड़ूस बाबुओं के द्वारा नचाये जाते हैं। बाबू भी एक से बढ़कर एक। एक जगह पर वर्षों से जमे हुए। अधिकारी तो आते जाते रहेंगे पर इनकी केवल कुर्सी बदलती है, पर तौर तरीका नहीं।
इनका अन्तर विभागीय ट्रांसफर भी नहीं होता, शहर नहीं बदलता। मंडल नहीं बदलता, सो ये अपने विभाग के जमे- जमाये ज़मींदार हैं। इनके आगे बड़े से बड़े अधिकारी भी लाचार हो जाते है , क्योंकि ये अधिकारियों के कलेक्टर हैं। इस विभाग में कर्मचारी ही इनकी खुराक है। अधिकारी इन्हीं बाबुओं के माध्यम से अनैतिक पैसा लेते है और अपने दुधारू गाय को कभी कोई मारता है क्या ?
वर्ष 1980 तक रेलवे में मंडल और जोन स्तर पर कार्मिक विभाग के मुखिया समान्य तौर पर अन्य विभाग के ग्रुप A अधिकारी होते थे, क्योंकि तब IRPS कैडर नहीं होता था। बाबुओं के हरकतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से IRPS कैडर बनी पर उल्टा ये हुआ कि ये बाबुओं के ही नियंत्रण में आ गये। कलम इनका पर दिमाग बाबु का, क्योंकि यह IRPS कैडर छटुंआ लोगो से बना था जैसे कीड़ा लगा हुआ कन्हा बैंगन जिसे लोग छाँट देते है ,उसी तरह।
यूपीएससी के द्वारा IAS का सपना देखने वाले पर IAS,IPS IRTS,IRAS नहीं बनने वाले Frustrated लोगों का कैडर। और छटुंआ लोगों में इतनी काबिलियत कहाँ कि इन घुंटे हुए बाबुओं को इनकी हरकतों के लिए टोक भी सके, रोकने की बात तो दूर। ग्रुप B से प्रमोट होकर आए ज्यादा अधिकारी भी इन्हीं जैसे होते हैं. कुछ अच्छे लोगों की ये चलने नहीं देते । और जो इन्हें चलाना चाहे इन्हें बाबु लोग नचा देते हैं।
कर्मचारी यूनियन के ये मौसेरा भाई हैं। दोनों में बड़ी सांठ-गांठ है, दोनों एक दूसरे के खुराक हैं, दाना पानी हैं, या कह सकते दल्ला भी। बाबु कर्मचारी का काम न करते, कर्मचारी को यूनियन जाने का राह दिखाते। यूनियन वाले चंदा और दान दक्षिणा लेकर बाबु से काम करवाते और वाहवाही के साथ साथ दोनों ही माल कमाते। कुछ बाबु यूनियन के पदाधिकारी भी बन जाते और अच्छे अधिकारी इनका बाल न बाँका कर पाते।
कड़वी सच्चाई यह है कि वेतन के अलावा अन्य किसी भत्ते का भुगतान बिना रिश्वतखोरी के नहीं होता। नियुक्ति, पदोन्नति से लेकर रिटायर तक हर काम बिना रिश्वत के नहीं होता। रिटायर होकर पूरा भुगतान लेने के लिए भी कर्मचारियों को अच्छी- ख़ासी रिश्वत देनी होती है जिसमें WI से लेकर Sr DPO तक की हिस्सेदारी होती है और ये रकम 15 – 20 हजार प्रति कर्मचारी हैं और जो नहीं देते उनका कोई न कोई भुगतान अटका दिया जाता है, जैसे- अंतिम महीने का वेतन भुगतान, ट्रांसपोर्ट भत्ता, DCRG, GIS आदि- आदि. PPO भी बैंक में भेजा नहीं जाता, जिससे कि कर्मचारी का पेंशन भी अटक जाता है।
मामले बहुतायत में हैं- कहानी परत दर परत खुलेगी प्याज की तरह और छिले जाएंगे संबंधित अधिकारी – लहसुन की कलियाँ की तरह और बाबू कूचे जाएंगे- अदरख की तरह। इस एपिसोड के अगले कुछ भाग में…
सफ़र जारी है..





