पटना. भिक्षाटन कर भोजन करने की परम्परा भारतीय समाज से लेकर भारतीय शासन व्यवस्था में आज भी कायम है और अब सक्षम लोग भी भिक्षाटन कर भोजन पाने में संकोच नहीं करते हैं । संख्या में ज्यादा भिक्षुक होने से कभी कभी इसे लंगर का भी रूप दे दिया जाता है और रुचिकर भोजन परोसा जाता है ।
इसे मुफ्तखोरी कहना कहीं से न्याय संगत नहीं होगा क्योंकी मुफ्तखोरी पर अब केवल समाज के वंचित लोगों का ही अधिकार नहीं है जो भोजन के लिए समाज में अपने से उच्चतम और सक्षम लोगों से अपेक्षा रखते थे। अब सक्षम लोग अपने से कमतर क्षमतावान लोगो से भिक्षाटन करते हैं, पर याचना नहीं आदेश करते हैं जैसे कभी चंबल के दस्यु ग्रामीणों से अधिकार और बलपूर्वक भोजन पाते थे।
भिक्षाटन अब याचना नहीं जबरिया अधिकार हो गया है और इसे बल पूर्वक प्राप्त किया जा रहा है, और ये आदत बीमारी का रूप ले चुकी है और बड़े-बड़े वाहनों में चलने वाले रेल के अधिकारी चम्बल के दस्युओं की तरह भोजन टैक्स वसूलते है।
यह बीमारी रेल के अधिकारियों को ज्यादा ही ग्रसित कर चुकी है . पहले अधिकारियों के दौरे कम होते थे तब फील्ड में पदस्थापित कनिष्ठ अधिकारी या कर्मचारी संस्कारवश अपने वरिष्ठ अधिकारियों के भोजन का प्रबंध कर दिया करते थे खासकर उस समय जब अधिकारियों का दौरा दूर दराज के क्षेत्रों में होता था ।
कर्मचारियों के इस संस्कार पालन को वरिष्ठ अधिकारी अपना अधिकार समझने लग गये और फरमाइशी भोजन के साथ-साथ रंगीन पानी की भी फरमाइश करने लगे और यहीं से कर्मचारियों का शोषण-दमन होने लग गया. इस मद में होने वाले खर्च को पूरा करने हेतु अपने अधीन कार्यरत संवेदक से भिक्षाटन करने लगे और जिनके मातहत संवेदक नहीं होते वे अधिनस्थ कर्मचारियों का दोहन करने लगे.
आजकल तो साहबान झुंड के झुंड में विशेष निरीक्षण यान से चलते हैं, जिसमें एसी, फ्रिज से लेकर आरामदायक बिस्तर भी लगा होता है और भोजन बनाने के लिए अत्याधुनिक चुल्हा भी होता है पर भोजन बनाने हेतु जो मुख्य पदार्थ अनाज, तेल- पानी मसाला नहीं होता और साहबान का कार्यक्रम की घोषणा होते ही फील्ड में पदस्थापित अधिकारियों/कर्मचारियों के पास अनाज, तेल- पानी मसाला के साथ-साथ नास्ता के लिए बिस्कुट, काजू- किशमिश, मखाना, दूध, चाय पत्ति, कॉफ़ी की लिस्ट चली जाती है और फील्ड के कर्मचारी माथा पीटने लगते हैं या फिर भिक्षाटन या दोहन में लग जाते हैं.
कुछ शातिर लोग इसी गंगा जी में डुबकी लगा अपना भी बारा- न्यारा कर लेते हैं और दो रुपये खर्च के बड़े चार- पाँच रुपये की वसुली कर लेते हैं। ऊपर वाले को इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं की इन फरमाइशी सामानों का खर्च कहाँ से आयेगा!






ई सब तो चलता ही रहता है, अंग्रेज चले गए और अपने बनाये घटिया कानून और उन कानून को अपना अधिकार समझने वाले घटिया अधिकारी वर्ग जनता का शोषण करने के लिए छोड़ गए।
इस पोस्ट को दो शब्दों में वर्णित किया जा सकता है:
निराधार
तथ्यहीन
संसाधनों की कितनी बर्बादी!